Saturday, November 1, 2008

करे कोई, भरे कोई

Posted by Jayshree varma

देखिए, हमारे देश के राजनेताओं को और जनता को। ये राजनेता अपने मतलब के लिए जनता को बहकाते है और ये बेवकूफ लोग उनकी बातों को मानकर भावुक बन जाते है। राजनेता तो आग लगाकर अपने-अपने महलों में आराम से सो जाते है और उनके इस लोमडियापन की किंमत बेचारी जनता चुकाती है। बात है गत सोमवार यानि २७ अक्टूबर की। इस दिन राहुल राज नामक एक बिहारी लडका मुठभेड में मारा गया। यह घटना मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने दस महिने पहले सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सामने जो गाली-गलौच की उसका परिणाम है। राज ठाकरे ने अपनी वोट बैंक को मजबूत बनाने के चक्कर में महाराष्ट्रवाद का झंडा लेकर उत्तर भारतीयों को गालियां देना शुरु किया और उनके पीछे-पीछे महाराष्ट्रीयनों का एक समूह भी जुड गया। शुरुआत में यह हमला मर्यादित था और उस वक्त एकाद हफ्ते बाद महाराष्ट्र पुलिस ने राज ठाकरे को अंदर कर दिया बाद में राज ठंडा हो गया तब ऐसा लग रहा था कि मामला शांत हो जायेगा लेकिन वहीं रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आए बिहारियों पर हमला हुआ और ज्वालामुखी भडक उठी। इस हमले के बाद चुप्पी साधे बैठे बिहारी भी मैदान में आ गये और उसके बाद ज्वालामुखी ने विराट स्वरुप ले लिया उसे देखते हुए लगता है कि यह मामला अब जल्द शांत होनेवाला नहीं है।
इन उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्रीयनों की खींचतान में २७ अक्टूबर को जो हुआ यह हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आये बिहारियों पर हमला हुआ उसके बाद बिहारियों का खून खौल उठा है और अभी वे जोश में है। इस जोश में राहुल राज नामक एक बिहारी विद्यार्थी पिस्तोल लेकर मुंबई आया। गत २६ अक्टूबर को वह पिस्तोल लेकर कुर्ला पहुंचा और बेस्ट की डबल डेकर बस में चढा। बस में कंडक्टर ने टिकट मांगी और उसके साथ ही राहुल जोश में आ गया और उसने कंडक्टर के सामने पिस्तोल ताक दी। पिस्तोल देख कंडक्टर भडक उठा और लोगों का डरना स्वाभाविक था।
मिनटों में पूरी बस खाली हो गई और राहुल अकेला बस में बैठा रहा। इस तमाशे को देखने के लिए बस के इर्द-गिर्द लोगों की भीड जमने लगी और भीड देख राहुल जोश में आ गया। उसने राज ठाकरे के खिलाफ नारेबाजी शुरु की और राज ठाकरे को जो संदेश देना चाहता था उसकी घोषणा कर दी। हमारे यहां सामान्य तौर पर पुलिस ऐसी कोई वारदात के बाद आती है लेकिन यहां वक्त पर आ गई और पुलिस ने राहुल को चेतावनी दी। चूंकि राहुल ने चेतावनी नहीं मानी और सामने गोली चलाई इसलिए पुलिस को गोली चलानी पडी जिसमें राहुल की मौत हो गई। यह कहानी पुलिस के मुताबिक है। लेकिन राहुल के लिए जिन लोगों के दिल में हमदर्दी है वे कुछ ओर ही कह रहे है। उनके मुताबिक राहुल ने किसी को चोट नहीं पहुंचाया और ना ही उसका इरादा किसी को मारने का था। वह तो सिर्फ अपना विरोध दिखाना चाहता था और इसलिए उसने यह अनोखा रास्ता चुना लेकिन मुंबई पुलिस में भी सभी राज ठाकरे जैसी सोचवाले है इसलिए एक बिहारी को गोली मारने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलता सो उन्होंने राहुल को गोली मार दी। पुलिस चाहती तो राहुल को पकड सकती थी लेकिन पुलिस को राहुल को पकडने में नहीं मारने में दिलचस्पी थी इसलिए उन्होंने उसे पकडने की कोशिश तक नहीं की। ऐसा राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग कह रहे है और यह गलत भी नहीं है। टीवी पर इस वारदात का जो क्लिपिंग्स दिखाया गया है उसे देखते हुए लगता है कि पुलिस ने थोडी इन्सानियत दिखाकर बल के बजाय अक्ल से काम लिया होता तो राहुल मारा न जाता। राहुल बस में अकेला था और वह कोई आतंकवादी नहीं था कि गोली चलाये और किसी को भी मौत के घाट उतार दे। उसके पास पिस्तोल थी लेकिन उसे पिस्तोल चलाना आता था या नहीं यह भी एक सवाल है। ऐसी स्थिति में पुलिस उसे घेरकर अक्ल से काम ले सकती थी। राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग इस तरह सही है।
एक जवान लडका इस तरह छोटे से अपराध के लिए पुलिस की गोली खाकर बेमौत मारा जाये यह बडे शर्म की बात तो है लेकिन उससे ज्यादा तो हमारी आंखे खोलने वाली है। राज ठाकरे या दूसरा कोई भी राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए कोई भी तमाशा खडा करे और उनके सामने राज जैसे नेता अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करे लेकिन सवाल यह है कि इनकी वजह से आम जनता को भडकने की क्या जरुरत है? पुलिस इस मामले निश्चित ही अक्ल से काम ले सकती थी लेकिन बजाय इसके अगर राहुल पिस्तोल लेकर ही ना गया होता और ना ही यह तमाशा खडा करता और ना ही उसकी जान जाती। राहुल ने नेताओं के बहकावे में आकर हीरो बनने की कोशिश की और उसकी किंमत उसे जान गंवाकर चुकानी पडी। इसके लिए किसीको दोष देना भी ठीक नहीं है। राज ठाकरे जो तमाशा कर रहे है वह एकदम बकवास है उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन राज की इस नौटंकी को बंद करने के लिए महाराष्ट्र सरकार बैठी है और उससे जो बन सकता है वह कर रही है। राहुल या अन्य किसीको राज ठाकरे को संदेश देने या पाठ पढाने के लिए मुंबई आने की क्या जरुरत है? राज को संदेश देना है तो उसके लिए दूसरे हजार रास्ते है लेकिन हाथ में पिस्तोल लेकर निकल पडो और लोगों को डराओ यह रास्ता ठीक नहीं। राज ठाकरे और उनके गुंडे यही काम करते है। और उनके सामने आप भी वहीं करोगे तो उनमें और आप में क्या फर्क रह जायेगा? गुंडागर्दी कर किसीकी हमदर्दी नहीं ली जा सकती और ना ही विरोध प्रदर्शित होता है।
मुंबई में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार है। गृहमंत्री आर.आर.पाटिल ने इस मुठभेड के बाद साफ शब्दों में कहा है कि पुलिस ने जो किया बिल्कुल सही है। कांग्रेस इस मामले क्या रवैया अपनाती है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। गुजरात में पुलिस ने आतंकवादियों के साथ संलग्न शोहराबुद्दीन नामक एक गेंगस्टर को उडा दिया उस मामले पर कांग्रेस ने पूरे देश में उधम मचा दिया। मुंबई में पुलिस ने जिसे उडाया वह आतंकवादी भी नहीं है ना ही गेंगस्टर है। पुलिस उसे आसानी से पकड सकती थी। लेकिन पुलिस ने उसे उडा दिया और उनकी ही सरकार के गृहमंत्री उसका खुलेआम बचाव कर रहे है। शोहराबुद्दीन के एन्काउन्टर के मामले में गुजरात सरकार का इस्तीफा मांगने वाली कांग्रेस के लिए यह अग्नि परीक्षा की घडी है।
इस मामले राजनीति शुरु हो गई है। एक ओर एनसीपी है तो दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की पार्टी जनता दल (यु) है। बिहार की दूसरी पार्टियों को न चाहते हुए भी नीतिश के साथ रहना पडेगा क्योंकि सवाल वोट बैंक का है। चूंकि इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा खुश राज ठाकरे है। क्योंकि उन्होंने जिस मकसद से उत्तर भारतीयों के विरोध में विवाद छेडा था वह मकसद आखिरकार सफल होता दिख रहा है। राज को और कितना खुश करना है यह उत्तर भारतीयों और महाष्ट्रीयनों के हाथ में है।
जय हिंद

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