Saturday, November 1, 2008

करे कोई, भरे कोई

Posted by Jayshree varma

देखिए, हमारे देश के राजनेताओं को और जनता को। ये राजनेता अपने मतलब के लिए जनता को बहकाते है और ये बेवकूफ लोग उनकी बातों को मानकर भावुक बन जाते है। राजनेता तो आग लगाकर अपने-अपने महलों में आराम से सो जाते है और उनके इस लोमडियापन की किंमत बेचारी जनता चुकाती है। बात है गत सोमवार यानि २७ अक्टूबर की। इस दिन राहुल राज नामक एक बिहारी लडका मुठभेड में मारा गया। यह घटना मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने दस महिने पहले सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के सामने जो गाली-गलौच की उसका परिणाम है। राज ठाकरे ने अपनी वोट बैंक को मजबूत बनाने के चक्कर में महाराष्ट्रवाद का झंडा लेकर उत्तर भारतीयों को गालियां देना शुरु किया और उनके पीछे-पीछे महाराष्ट्रीयनों का एक समूह भी जुड गया। शुरुआत में यह हमला मर्यादित था और उस वक्त एकाद हफ्ते बाद महाराष्ट्र पुलिस ने राज ठाकरे को अंदर कर दिया बाद में राज ठंडा हो गया तब ऐसा लग रहा था कि मामला शांत हो जायेगा लेकिन वहीं रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आए बिहारियों पर हमला हुआ और ज्वालामुखी भडक उठी। इस हमले के बाद चुप्पी साधे बैठे बिहारी भी मैदान में आ गये और उसके बाद ज्वालामुखी ने विराट स्वरुप ले लिया उसे देखते हुए लगता है कि यह मामला अब जल्द शांत होनेवाला नहीं है।
इन उत्तर भारतीयों के खिलाफ महाराष्ट्रीयनों की खींचतान में २७ अक्टूबर को जो हुआ यह हमारी आंखें खोलने के लिए काफी है। रेलवे बोर्ड की परीक्षा देने आये बिहारियों पर हमला हुआ उसके बाद बिहारियों का खून खौल उठा है और अभी वे जोश में है। इस जोश में राहुल राज नामक एक बिहारी विद्यार्थी पिस्तोल लेकर मुंबई आया। गत २६ अक्टूबर को वह पिस्तोल लेकर कुर्ला पहुंचा और बेस्ट की डबल डेकर बस में चढा। बस में कंडक्टर ने टिकट मांगी और उसके साथ ही राहुल जोश में आ गया और उसने कंडक्टर के सामने पिस्तोल ताक दी। पिस्तोल देख कंडक्टर भडक उठा और लोगों का डरना स्वाभाविक था।
मिनटों में पूरी बस खाली हो गई और राहुल अकेला बस में बैठा रहा। इस तमाशे को देखने के लिए बस के इर्द-गिर्द लोगों की भीड जमने लगी और भीड देख राहुल जोश में आ गया। उसने राज ठाकरे के खिलाफ नारेबाजी शुरु की और राज ठाकरे को जो संदेश देना चाहता था उसकी घोषणा कर दी। हमारे यहां सामान्य तौर पर पुलिस ऐसी कोई वारदात के बाद आती है लेकिन यहां वक्त पर आ गई और पुलिस ने राहुल को चेतावनी दी। चूंकि राहुल ने चेतावनी नहीं मानी और सामने गोली चलाई इसलिए पुलिस को गोली चलानी पडी जिसमें राहुल की मौत हो गई। यह कहानी पुलिस के मुताबिक है। लेकिन राहुल के लिए जिन लोगों के दिल में हमदर्दी है वे कुछ ओर ही कह रहे है। उनके मुताबिक राहुल ने किसी को चोट नहीं पहुंचाया और ना ही उसका इरादा किसी को मारने का था। वह तो सिर्फ अपना विरोध दिखाना चाहता था और इसलिए उसने यह अनोखा रास्ता चुना लेकिन मुंबई पुलिस में भी सभी राज ठाकरे जैसी सोचवाले है इसलिए एक बिहारी को गोली मारने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलता सो उन्होंने राहुल को गोली मार दी। पुलिस चाहती तो राहुल को पकड सकती थी लेकिन पुलिस को राहुल को पकडने में नहीं मारने में दिलचस्पी थी इसलिए उन्होंने उसे पकडने की कोशिश तक नहीं की। ऐसा राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग कह रहे है और यह गलत भी नहीं है। टीवी पर इस वारदात का जो क्लिपिंग्स दिखाया गया है उसे देखते हुए लगता है कि पुलिस ने थोडी इन्सानियत दिखाकर बल के बजाय अक्ल से काम लिया होता तो राहुल मारा न जाता। राहुल बस में अकेला था और वह कोई आतंकवादी नहीं था कि गोली चलाये और किसी को भी मौत के घाट उतार दे। उसके पास पिस्तोल थी लेकिन उसे पिस्तोल चलाना आता था या नहीं यह भी एक सवाल है। ऐसी स्थिति में पुलिस उसे घेरकर अक्ल से काम ले सकती थी। राहुल के लिए जिन्हें हमदर्दी है वे लोग इस तरह सही है।
एक जवान लडका इस तरह छोटे से अपराध के लिए पुलिस की गोली खाकर बेमौत मारा जाये यह बडे शर्म की बात तो है लेकिन उससे ज्यादा तो हमारी आंखे खोलने वाली है। राज ठाकरे या दूसरा कोई भी राजनेता अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए कोई भी तमाशा खडा करे और उनके सामने राज जैसे नेता अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी करे लेकिन सवाल यह है कि इनकी वजह से आम जनता को भडकने की क्या जरुरत है? पुलिस इस मामले निश्चित ही अक्ल से काम ले सकती थी लेकिन बजाय इसके अगर राहुल पिस्तोल लेकर ही ना गया होता और ना ही यह तमाशा खडा करता और ना ही उसकी जान जाती। राहुल ने नेताओं के बहकावे में आकर हीरो बनने की कोशिश की और उसकी किंमत उसे जान गंवाकर चुकानी पडी। इसके लिए किसीको दोष देना भी ठीक नहीं है। राज ठाकरे जो तमाशा कर रहे है वह एकदम बकवास है उसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन राज की इस नौटंकी को बंद करने के लिए महाराष्ट्र सरकार बैठी है और उससे जो बन सकता है वह कर रही है। राहुल या अन्य किसीको राज ठाकरे को संदेश देने या पाठ पढाने के लिए मुंबई आने की क्या जरुरत है? राज को संदेश देना है तो उसके लिए दूसरे हजार रास्ते है लेकिन हाथ में पिस्तोल लेकर निकल पडो और लोगों को डराओ यह रास्ता ठीक नहीं। राज ठाकरे और उनके गुंडे यही काम करते है। और उनके सामने आप भी वहीं करोगे तो उनमें और आप में क्या फर्क रह जायेगा? गुंडागर्दी कर किसीकी हमदर्दी नहीं ली जा सकती और ना ही विरोध प्रदर्शित होता है।
मुंबई में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार है। गृहमंत्री आर.आर.पाटिल ने इस मुठभेड के बाद साफ शब्दों में कहा है कि पुलिस ने जो किया बिल्कुल सही है। कांग्रेस इस मामले क्या रवैया अपनाती है यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। गुजरात में पुलिस ने आतंकवादियों के साथ संलग्न शोहराबुद्दीन नामक एक गेंगस्टर को उडा दिया उस मामले पर कांग्रेस ने पूरे देश में उधम मचा दिया। मुंबई में पुलिस ने जिसे उडाया वह आतंकवादी भी नहीं है ना ही गेंगस्टर है। पुलिस उसे आसानी से पकड सकती थी। लेकिन पुलिस ने उसे उडा दिया और उनकी ही सरकार के गृहमंत्री उसका खुलेआम बचाव कर रहे है। शोहराबुद्दीन के एन्काउन्टर के मामले में गुजरात सरकार का इस्तीफा मांगने वाली कांग्रेस के लिए यह अग्नि परीक्षा की घडी है।
इस मामले राजनीति शुरु हो गई है। एक ओर एनसीपी है तो दूसरी ओर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार की पार्टी जनता दल (यु) है। बिहार की दूसरी पार्टियों को न चाहते हुए भी नीतिश के साथ रहना पडेगा क्योंकि सवाल वोट बैंक का है। चूंकि इस घटनाक्रम से सबसे ज्यादा खुश राज ठाकरे है। क्योंकि उन्होंने जिस मकसद से उत्तर भारतीयों के विरोध में विवाद छेडा था वह मकसद आखिरकार सफल होता दिख रहा है। राज को और कितना खुश करना है यह उत्तर भारतीयों और महाष्ट्रीयनों के हाथ में है।
जय हिंद

Monday, October 20, 2008

यह अचानक क्या हुआ ?

Posted by Jayshree varma

जमाना तो नहीं बदला लेकिन कांग्रेस जरुर बदल गई है। जी हां ! दिल्ली में गत महिने हुए बम ब्लास्ट के बाद दिल्ली के जामिया नगर में स्थित बाटला हाउस नामक मकान में हुए एन्काउन्टर के मामले शुरु हुई राजनीति में गर्मी आ गई है। अब तक तो समाजवादी पार्टी और उनके जैसे दंभी सांप्रदायिक और वोट बैंक के लिए मुसलमानों के सामने मुजरा करने में जिन्हें जर्रा सी भी शर्म नहीं आती ऐसी जमात ही इस मामले पर हो-हल्ला मचा रही थी लेकिन शनिवार को कांग्रेस भी बडी बेशर्मी के साथ इस राजनीति में शामिल हो गई इसके साथ ही इस मामले में एक जबरदस्त मोड आ गया है।
जामिया नगर के बाटला हाउस में एन्काउन्टर हुआ.... पुलिस ने दो आतंकवादियों को मार गिराया और दो को दबोचा ठीक उसके दूसरे दिन एक टीवी चैनल ने कह दिया कि यह एन्काउन्टर नकली था और पुलिस ने एकदम बेकसूर मुस्लिम युवकों को मार गिराया। इस टीवी चैनल ने ऐसा दावा भी किया था कि इस एन्काउन्टर में शहीद हुए मोहनचंद शर्मा वास्तव में पुलिस की गोली का शिकार हुए है। हमारे यहां टीवी चैनलों के बीच टीआरपी बढाने की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा चलती है इसलिए यह लोग कुछ भी कर बैठते है। इस चैनल ने भी वही किया लेकिन इसकी वजह से समाजवादी पार्टी को अच्छा-खासा मौका मिल गया और इसने इस मामले पर हो-हल्ला मचाना शुरु कर दिया। अमर सिंह इन सबमें सबसे पहली श्रेणी में आते है। क्योंकि वे मुलायम सिंह के खास भरोसेमंद है। अमर सिंह ने अपना नाटक जमाया और उनके पीछे-पीछे वामपंथी भी जुड गये बाद में बंगाल में से टाटा को भगाने के बाद बेकार बैठी ममता भी इसमें जुड गई। बची कसर को अमरसिंह ने शुक्रवार को जामिया नगर में बाटला हाउस में सार्वजनिक सभा का आयोजन कर पूरी कर दी। इस सभा में मुसलमानों की बडी संख्या देख कांग्रेस के होश उड गये। दिल्ली में दो महिने बाद विधानसभा चुनाव होने है बाद में चार-पांच महिने बाद लोकसभा चुनाव भी है ऐसी स्थिति में अगर मुसलमान नाराज हो जाये तो कांग्रेस का राम नाम सत्य हो जाये ऐसा सोचकर कांग्रेस भी इस मामले में आगे आई। और ताबडतोब शनिवार को ही अपने मुस्लिम नेताओं को आगे कर इस एन्काउन्टर के मामले ज्युडिशियल इन्कवायरी की मांग कर डाली। कांग्रेस के अल्पसंख्यक नेताओं के प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री से मिलकर इस एन्काउन्टर के मामले ज्युडिशियल इन्कवायरी की मांग की है और अभी केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है इसे देखते हुए इसमें दो राय नहीं की इस मांग का स्वीकार होगा। कांग्रेस ने अमर सिंह या ममता की तरह यह एन्काउन्टर नकली था ऐसा नहीं कहा है लेकिन ऐसा कहने की जरुरत भी नहीं है। और अगर कांग्रेस ऐसा कह दे कि यह एन्काउन्टर नकली था तो उसके विरोधी बाकायदा कांग्रेस को शिकंजे में लेंगे और कांग्रेस के शासन में मुसलमानों का एन्काउन्टर होता है ऐसा हल्ला मचा देंगे इसलिए कांग्रेस सीधे नहीं कह सकती लेकिन ज्युडिशियल इन्कवायरी की मांग का मतलब साफ है कि इस एन्काउन्टर में कुछ तो गलत है।
कांग्रेस ने खुद सामने से जांच की घोषणा करने के बजाय अपने कांग्रेसी अल्पसंख्यक नेताओं के प्रतिनिधिमंडल को आगे कर इस एन्काउन्टर के मामले जांच की मांग क्यों की? यह समझने जैसी बात है। इस मामले अमर सिंह मंडली ने हो-हल्ला मचाया उसके बाद कांग्रेस ने शुरु में उनकी बात नहीं सुनी। अमर सिंह का नाटक बढा उसके बाद कांग्रेस ने स्पष्टता की कि इस एन्काउन्टर के मामले किसी भी प्रकार की जांच का सवाल ही नहीं उठता और अब जो होगा अदालत में होगा। इस रवैये को दाद देने जैसा था। चूंकि सामने कांग्रेस में भी अर्जुन सिंह जैसे कुछेक नेता ऐसे थे जो अमर सिंह के सूर में सूर मिला रहे थे लेकिन उस समय कांग्रेस ने उनकी आवाज दबा दी थी। अब दिल्ली में अमर सिंह ने सभा संबोधित की उसके बाद कांग्रेसी डर गये लेकिन पहले कांग्रेस ने कहा था कि ज्युडिशियल इन्कवायरी नहीं होगी तो फिर सामने से जांच की घोषणा नहीं की जा सकती इसलिए उसने अपने कांग्रेसी अल्पसंख्यक विभाग के प्रतिनिधिमंडल में शामिल नेताओं को आगे कर इस एन्काउन्टर के मामले ज्युडिशियल इन्कवायरी की मांग करा दी।
कांग्रेस की यह मांग आघात जनक है। आघात इस बात का नहीं कि कांग्रेस ने यह मांग क्यों की क्योंकि कांग्रेस से दूसरी कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती। दु:ख तो हमारे यहां वोट बैंक के लिए नेता कितनी हद तक गिर सकते है यह देखकर होता है। अमर सिंह मंडली के लिए मुसलमान माई-बाप है और उनकी राजनीति की दुकान भी उन पर ही चलती है इसलिए यह लोग ऐसे मौके की तलाश में ही रहते है लेकिन कांग्रेस को ऐसा क्यों करना पडा यह समझ में नहीं आ रहा। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार है और दिल्ली पुलिस सीधे उनकी हूकुमत में आती है उसे देखते हुए अगर कांग्रेस को लगता है कि इस एन्काउन्टर में कुछ गलत हुआ है तो उसे तुरंत उन जिम्मेदार अधिकारियों को घर रवाना कर देना चाहिए। भला ऐसा करने से उसे कौन रोक सकता है। यह उसकी हूकुमत में आता है लेकिन कांग्रेस ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे दोनों हाथों से लड्डू खाना है। एक ओर वह आतंकवाद के सामने लडने में आक्रामक तेवर अपना रही है और इस मामले में किसी को छोडना नहीं चाहती वहीं दूसरी ओर मुसलमानों को नाराज करने को भी तैयार नहीं है। कांग्रेस को डर है कि यह एन्काउन्टर नकली था और पुलिस ने बेकसूर मुसलमानों को मार गिराया ऐसा कह दो-चार पुलिसवालों को घर भगा दे या मोहनचंद शर्मा की शहादत पर दाग लगाये तो हिन्दू भडक उठेंगे और भाजपा को एक अच्छा खासा मुद्दा मिल जायेगा वहीं दूसरी ओर अगर अमरसिंह और ममता को आगे बढने दे तो यह लोग मुस्लिम वोट बैंक हजम कर लेंगे। उसे यह दोनों चाहिए। इसलिए यह बीच का रास्ता चुना गया। एक ओर ज्युडिशियल इन्कवायरी का नाटक चलें और दूसरी ओर चुनाव से भी निपटा जायें। भला कांग्रेसियों को कौन समझाये कि यह नामुमकिन है। इसमें तो कांग्रेस की हालत धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का जैसी हो जायेगी।
कांग्रेस और अमरसिंह या ममता चाहे राजनीति खेलें लेकिन सवाल नैतिकता का है। यह लोग जो कह रहे है उसके समर्थन में उनके पास कोई सुबूत नहीं है। पुलिस ने जो एन्काउन्टर किया वह सुबह के उजाले में किया और उसमें एक पुलिस अधिकारी शहीद हुआ। इस एन्काउन्टर में शक की कोई गुंजाइश नहीं है फिर भी इसे शक के दायरे में खींच कर राजनीति खेली जा रही है। अब इससे ज्यादा मैं क्या कहूं ?
जय हिंद

Thursday, October 16, 2008

ममता और माया : राजनीतिक नौटंकी

Posted by Jayshree varma

मायावती वर्सिस सोनिया और रायबरेली की रणभूमिकेन्द्रीय रेलमंत्री लालूप्रसाद यादव ने 2008-09 के रेल बजट में सोनिया गांधी के संसदीय मतक्षेत्र रायबरेली में रेलवे के डिब्बे बनाने के प्रोजेक्ट की घोषणा की थी। इस प्रोजेक्ट को सोनिया गांधी का ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ माना जाता है क्योंकि इस प्रोजेक्ट के तहत रायबरेली में 10 हजार लोगों को नौकरी मिलने वाली है। इस प्रोजेक्ट में रेल मंत्रालय रु। 1000 करोड का निवेश करेगा और 2010 में उत्पादन शुरु होगा। प्रथम वर्ष 1200 डिब्बे और उसके बाद हर साल 1500 डिब्बों का निर्माण इस प्लान्ट में होगा। इस प्रोजेक्ट के लिए मायावती सरकार ने ही 400 एकड जमीन का आवंटन भी रेल मंत्रालय को कर दिया था और ग्रामसभा ने इस जमीन का कब्जा भी रेल मंत्रालय को सौंप दिया था। 14 अक्तूबर को इस प्लान्ट का शिलान्यास होनेवाला था और उसके चार दिन पहले यानि कि 10 अक्तूबर को रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट संतोष कुमार श्रीवास्तव ने घोषणा की कि राज्य सरकार ने यह जमीन रेल मंत्रालय को सौंप दी थी लेकिन इस जमीन पर कोई प्रोजेक्ट शुरु न होने के कारण किसानों में असंतोष था और वे अपनी जमीन वापस चाहते है इसलिए राज्य सरकार ने इस जमीन आवंटन को रद्द करने का निर्णय लिया है। 11 अक्तूबर को मायावती ने रायबरेली के डिस्ट्रिक्ट मेजिस्ट्रेट के रिपोर्ट के आधार पर रेल मंत्रालय को जमीन आवंटन रद्द करने की घोषणा की और उसके कारण सोनिया एवं लालू जिसमें उपस्थित रहने वाले थे उस शिलान्यास को स्थगित रखना पडा। रेल मंत्रालय ने मायावती सरकार के निर्णय को सुप्रीमकोर्ट में ललकारा है और सुप्रीमकोर्ट ने जमीन आवंटन रद्द करने के निर्णय के सामने स्टे दिया है। अब 17 अक्तूबर को सुनवाई होगी। रेल मंत्रालय ने राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय आए तो रायबरेली में ही रेलवे की जमीन पर इस फैक्ट्री को शुरु करने की घोषणा कर दी है इसे देखते हुए इसमें दो राय नहीं कि यह प्रोजेक्ट रायबरेली में ही शुरु होगा।हम जब दुनिया के दूसरे देशों की ओर देखें और उन देशों के विकास की ओर नजर डालें तब अफसोस होगा कि जिनके पास कोई स्त्रोत नहीं है, कोई ताकत नहीं है, मेनपावर नहीं है ऐसे देश आज समृद्ध है। हमारे पास सब कुछ होते हुए भी हम कंगाल जैसी स्थिति में जीने को मजबूर है। यह सवाल बार-बार जेहन में उठता है और इसका सिर्फ एक ही जवाब है हमारी सियासत और राजनेता। हमारा देश पिछडेपन और कंगाल अवस्था में जीने को क्यों मजबूर है? हम सबसे पिछडे क्यों है? क्योंकि हमारे देश में शासनकर्ताओं की एक ऐसी जमात मौजूद है और उनके रहते हमारा देश कभी विकास की बुलंदी को नहीं छु सकता। इन नेताओं ने अपने निजी स्वार्थ के कारण इस देश के विकास में अडचन डाल दी है।रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री को दी गई जमीन का आवंटन रद्द होना तथा कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी को सार्वजनिक रैली को संबोधित करने से रोकने के लिए धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश इन दोनों के कारण उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी सरकार की अक्ल पर तरस आती है।इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उस 400 एकड जमीन के मामले पर यथास्थिति बनाये रखने के आदेश दिए हैं जिसका आवंटन मायावती सरकार ने इस तर्क के साथ रद्द कर दिया कि वहां के किसान रेल कोच के लिए जमीन देने को तैयार नहीं है। चूंकि भारत सरकार एवं अन्य तथा रायबरेली के किसानों की ओर दाखिल याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने यथास्थिति कायम रखने का अंतरिम आदेश दे दिया अत: बाजी हाथ से जाने की आशंका के चलते मायावती सरकार ने धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश जारी कर दिये। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को शिकस्त देने में चालाकी, चालबाजी और चतुराई की अपनी भूमिका होती है। यहां समझ में आ रहा है कि ऐसे क्षुद्र टोटकों को आजमाकर मायावती अपनी ही फजीहत लेंगी।राजनीति में मायावती का अपना धाकड अंदाज है। इसी के चलते वह कई बार तानाशाह जैसी भूमिका में दिखाई देती है। दूसरी बात सत्ता की गर्मी उनके सिर पर कितनी ही बार इस हद तक चढी देखी गई कि राजनीति में न्यूनतम संकोच और मर्यादा का पालन तक होते नहीं दिखा।राजनीतिक जीवन और पद दोनों के मामले में किसी को अमर नहीं कहा जा सकता। वास्तव में कोच फैक्ट्री के भूमि आवंटन को रद्द किये जाने से भारतीय राजनीति में नये संक्रमण के संकेत मिलते हैं। प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल को श्रेय से वंचित करने के लिए अडंगा डालने की राजनीति की जो शुरुआत पश्चिम बंगाल में सिंगूर में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने की उसे रायबरेली में मायावती ने आगे बढाया है। साणन्द (गुजरात) में कांग्रेस के प्रवक्ता अर्जुन मोढवाडिया भी इस रास्ते पर चलने की सोच रहे हैं। कुल मिलाकर महसूस होने लगा है कि कुछ ठीक नहीं हो रहा है। जहां तक मायावती की बात है, तो वह सत्ता की दादागिरी के चक्कर में कांग्रेस को ही पैर जमाने का मौका दे बैठी है।कुछ समय पूर्व बंगाल में ममता बनर्जी ने ऐसी ही भावना का प्रदर्शन कर रतन टाटा को बंगाल से भगाया था और अब मेडम माया की बारी है। ममता की लडाई गलत नहीं थी लेकिन उनका स्वार्थ गलत था। मायावती ने अभी जिस तरह रायबरेली में रेल कोच फैक्ट्री के प्रोजेक्ट में अडचन पैदा की है यह उनकी तुच्छ मानसिकता को प्रदर्शित करता है। ममता के किस्से में तो यह विरोध पार्टी में है और उन्हें राजनीतिक तौर पर फिर से खडे होने के लिए एक नौटंकी की जरुरत थी इसलिए उन्होंने यह खेल खेला लेकिन मायावती के किस्से में तो यह मजबूरी भी नहीं है। मायावती उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री है और उनके राज्य में एक बडा प्रोजेक्ट आए, इससे 10 हजार लोगों को नौकरी मिलेगी, तब तो उन्हें इस प्रोजेक्ट के कारण खुश होना चाहिए और इस प्रोजेक्ट का स्वागत करना चाहिए लेकिन मेडम इस प्रोजेक्ट का सत्यानाश करने पर तुली है।आज जब बडी कंपनियां अपने राज्य में प्रोजेक्ट लेकर आए तो इसके लिए मुख्यमंत्री उद्योगपतियों से अपील करते है लेकिन माया मेडम राजनीतिक हिसाब करने में लगी है यह देखकर दु:ख होता है। जिस देश में ऐसे राजनेता हो वह देश कभी अमरिका या जापान या जर्मनी को छोडो लेकिन चीन या कोरिया की बरोबरी भी नहीं कर सकता। राज्य का जो होना है हो और लोगों को नौकरी मिले या ना मिले लेकिन उनका स्वार्थ पूरा होना चाहिए। अगर हमारा शासनकर्ता ऐसा मानता है तो ऐसा नेता देश का विकास करवा सकेंगे?रायबरेली के प्रोजेक्ट के मामले सबसे आघातजनक बात तो यह है कि उन्होंने जिस जमीन के आवंटन को रद्द किया यह जमीन उन्होंने ही रेल मंत्रालय को दिया था। उस वक्त मायावती और कांग्रेस के बीच हनीमुन चल रहा था इसलिए मायावती कांग्रेस पर फिदा थी और मेडम सोनिया की हर बात में हां में हां मिलाने को अपना सौभाग्य समझती थी। रायबरेली सोनिया गांधी का मतक्षेत्र है इसलिए उन्होंने झुमते हुए यह जमीन आवंटित किया था। उसके बाद अब तक जैसा होता रहा है वैसा कांग्रेस के साथ भी मायावती का अनबन हुआ इसलिए वे कांग्रेस को दबोचने का मौका ढूंढती रहती है। कांग्रेस ने मुलायम के साथ हाथ मिलाया इसलिए माया मेडम ज्यादा क्रोधित हो गई है और कांग्रेस का पत्ता साफ करने का एक भी मौका गवाना नहीं चाहती। कांग्रेस और मायावती कुश्ती करे या हनीमुन मनाए इससे लोगों को कोई लेना-देना नहीं है लेकिन इसके कारण विकास पर जो असर हो रहा है यह बिल्कुल नहीं चलेगा।मायावती को इन सब से कोई लेना-देना नहीं है। मायावती भारतीय राजनीति में एक अजीब केरेक्टर है और उनमें दिमाग या तमीज नाम की कोई चीज नहीं है। इनका जिनके साथ अनबन हो जाए उनका सत्यानाश करने में वे किसी भी हद तक जा सकती है। अमरसिंह से लेकर अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी से लेकर आडवानी तक सभी को इन्होंने अपना कातिल अंदाज दिखा दिया है। मेडम जिनके सामने विरोध जताती है उनकी गरज पडे उन्हें गले लगाने में भी इन्हें कोई झिझक महसूस नहीं होती। एक जमाने में मायावती और भाजपा साथ-साथ थे तब मायावती लालजी टंडन को अपना भाई कहती और आडवानी को पिता समान गिनती थी। भाजपा के साथ अनबन होने बाद मेडम भाजपा के नेताओं के कान से कीडे रैंगे ऐसी गालियां देती है। मायावती के लिए यह बहुत ही मामूली बात है। कल को अगर जरुरत पडे तो यह आडवानी को बाप बनाकर पांव पड सकती है और राजनाथ को भाई बनाकर राखी भी बांध सकती है। हमें इससे कोई ऐतराज नहीं है। आडवानी या राजनाथ को ऐतराज ना हो तो हम भला कौन होते है? यूं तो रायबरेली में रेल प्रोजेक्ट स्थापित नहीं हो तो भी हमें कोई ऐतराज नहीं और उसका हमें कोई फर्क नहीं पडता लेकिन हम कहां माया या ममता जैसी मानसिकता वाले है। हम तो पूरे देश को एक मानकर सोचते है इसलिए दु:खी होना पडता है।माया-ममता या अन्य इनके जैसे लोग एक महत्वपूर्ण बात भूल जाते है। ऐसे छोटे-छोटे मुद्दों से इनका स्वार्थ पूरा होता होगा और दो-चार दिन का नशा चढता होगा लेकिन इससे समाज को और आम आदमी को कोई लाभ नहीं मिलता है। अगर किसी शासक को ज्यादा लंबे समय तक टिकना है तो इन सब मुद्दों को एक ओर रख लोगों के लिए सोचने की आदत डालनी चाहिए, विकास को महत्व देना चाहिए। लोग विकास को याद रखेंगे। आपके स्वार्थभरे विजय को नहीं। धन्य है हमारे देश के यह नेता! ऐसे नेता हो तो हमारा देश आगे कैसे आयेगा?
जय हिंद
जयश्री Varma

Saturday, October 11, 2008

अजीत जोगी:एक व्यक्तीत्व

Posted by दीपक


जीत जोगी एक ऐसा नाम है जो जितना अधिक विवादित रहा उतना अधिक प्रचलीत ,उनकी डिग्री और उनकी त्वरा स्वयमेव उनके विद्वता का परिचय देती है।छ्त्तीसगढ की राजनिती मे इस नाम के कारण अनेक खल-बली मची । कई बार केंद्रीय मंत्री रह चुके विद्याचरण शुक्ल ने इनके मुख्यमंत्री बनते ही कांग्रेस को अलविदा कह दिया ।हम तो डुबेंगे सनम मगर तुम्हे भी साथ ले डुबेंगे की तर्ज पर खुद भी नही जीतें और कांग्रेस को भी नही जीतने दिया ।फ़लतः ताज गरीबो के डाक्टर रमन सिंग के हिस्से आया और कांग्रेस को राजनितीक वनवास भोगना पडा।

अजीत जोगी का नाम समझौतावादी नही रहा शायद इसलिये अधिक विवादीत रहा । मुख्यतः व्यक्ती का व्यक्तीत्व इसी बात से प्रगट होता है कि आप किन-किन चीजो का विरोध करते है ।इसलिये अजीत जोगी एक व्यक्तीत्व बनकर उभरा और समझौतो की राजनिती मे विद्रोह का नया पुलक दिखाई दिया। इनके तीन साल की सक्रीय राजनिती ने अनेक नेताओ के बीस वर्षो से अधिक के राजनितीक वजुद को हिला दिया । कई बार केंद्रीयमंत्री रह चुके विद्याचरण शुक्ल इसका साक्षात प्रमाण है ।उन्हे उनके ही गढ राजिम मे एक लाख से अधिक वोटो से हराने का कारनामा अजीतजोगी जैसा कोई व्यक्तित्व ही कर सकता है ।इस हार के परिणामस्वरुप विद्याचरण को भी शरदपवार की पार्टी को अलविदा कहना पडा और वो कांग्रेसविरोधी से फ़िर कांग्रेसी हो गये।

विधायक खरीद-फ़रोख्त मामले मे बुरी तरह से उलझजाने के बाद उनके समर्थको को तनिक निराशा जरुर हुयी मगर जनता जानती है कि आज की राजनिती मे यह कर्मकाण्ड सभी संपादीत कर रहे है कोई परदे के पिछे है तो कोई परदे के सामनें ।जनता भी अब राजनिती मे चौबीस केरेट व्यक्तीत्व की अपेक्षा नही करती इसलिये दिगर नेताओ के बारह केरेट व्यक्तीत्व के मुकाबले यह अठठारह केरेट व्यक्तीत्व लोगो मे लोकप्रिय होने लगा ।फ़र्श से अर्श तक का सफ़र करने वाले जोगी जी मे साहस और दृढ संकल्प की कमी नही है इसलिये उन्होने रमन सिंग को ही चुनाव मे ललकार लिया साथ ही हाईकमान के आदेश की बात जोडकर यह भी सिद्ध कर दिया कि उनके अंदर एक चतुर कलेक्टर अभी भी जीवित है ।

अपने हर भाषण मे धाराप्रवाह मे छ्त्तीसगढी बोलकर जहा वो आम लोगो से जूडते है वहा तथाकथीत शिक्षीत लोगो को(जिन्हे छ्त्तीसगढी बोलने मे शर्म आती है) अपनी संस्कृती के सम्मान का संदेश भी भी दे देते है।अजीत जोगी साधारण नेताओ की परिपाटी से सर्वथा विपरीत त्वरीत निर्णय लेने वाले व्यक्तीत्व रहे और मेरा मानना है निर्णय लेना एक आवश्यक गुण है जो व्यक्ती जितनी जल्दी से निर्णय लेगा वह अपनी गलती भी उसी तेजी से सुधार सकता है ।पुर्व कलेक्टर होने की वजह से धरने-प्रदर्शनो की जमिनी हकिकत और खोखलापन उन्हे भलि-भांती ज्ञात था इसलिये उनके कार्यकाल मे धरने-प्रदर्शन के हथकंडे कुछ खास असर ना दिखा सकें।कलेक्टरी का असर भी था इसलिये दफ़्तरो मे यह नाम तनाव पैदा करता था परंतु वर्तमान सरकारी तंत्र को दुरुस्त करने के लिये ऐसा तनाव जरुरी है अन्यथा इसके आभाव मे विकास की कल्पना मात्र कल्पना रह जायेगी ।

युवाओ को प्रोत्साहित करनेवाले और नये चेहरो पर भरोसा करने वाले इस व्यक्तीत्व ने छ्त्तीसगढ मे अपनी छाप छोडी है और निश्चय ही इनमे एक कुशल लीडर के सारे गुण है ।साधारणतः नेता सिर्फ़ इलेक्टेड होते है जब्की आई.ए.एस अफ़सर सलेक्टॆड ।ये इलेक्टेड भी है और सलेक्टेड भी इसलिये मुझे इनका व्यक्तीत्व प्रभावी और रोचक लगा ।अजीत जोगी एक आम आदमी की संभावना ,इच्छाशक्ती और संकल्प का दुसरा नाम है।यह एक ऐसा आम आदमी है जिसने अपनी सारी सफ़लता अपने दम अर अर्जीत की है।उनके व्यक्तीत्व पर सटीक बैठती सुमन जी की इन पंक्तियो के साथ उनके इस जजबे को सलाम....

क्या हार मे क्या जीत मे ।
किंचीत भी भयभीत मे
स्वपन पथ की चाह में
यह भी सही वह भी सही
वरदान मागुंगा नही ।

दीपक शर्मा

Friday, October 10, 2008

यह बडे ताज्जुब की बात है...

Posted by Jayshree varma


हमारे देश में मुस्लिम वोट बैंक के लिए राजनेता किसी भी हद तक गिर सकते है और ऐसी राजनीति ओर किसी देश में देखने नहीं मिलेगी। मुस्लिम मतों के लिए हमारे राजनेता जिस तरह मुसलमानों को खुश करने के प्रयास करते है ऐसा तो मुस्लिम देशों में भी नहीं होता होगा। और इसका ताजा उदाहरण समाजवादी पार्टी के नेता अमरसिंह ने दिल्ली में एन्काउन्टर में मारे गये दो आतंकवादियों के मौत के मामले शुरु की कोशिश है।
कौन है यह अमरसिंह ? चलिए, सबसे पहले जानते हैं अमरसिंह के बारे में।
अमरसिंह की करम कुंडली कुछ इस प्रकार है...
27 जनवरी 1956 के दिन उ.प्र. के अलीगढ में पैदा हुए अमरसिंह की परवरिश और पढाई कोलकाता में हुई। मध्यमवर्गीय राजपूत खानदान के अमरसिंह ने हिन्दी मीडियम में पढाई की और सेन्ट जेवीयर्स में से ग्रेजुएट हुए। कोलकाता में अपनी राजनैतिक करियर की शुरुआत करनेवाले अमरसिंह मूल कांग्रेसी है और बुराबझार जिला कांग्रेस समिति के मंत्री के रूप में इन्होंने अपने करियर की शुरुआत की थी। अमरसिंह आज अरबोपतियों में से एक है और इसकी शुरुआत भी वे कांग्रेस में थे तब से हुई थी। कोलकाता में 1980 में उनकी मुलाकात कांग्रेसी नेता वीरबहादुर सिंह के साथ हुई और अमरसिंह ने इसका जमकर लाभ उठाया। 1985 में वीर बहादुर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बने उसके बाद नये उद्यमियों को सिर्फ एक प्रतिशत ब्याज पर राशि देनेवाली राशि संस्थाओं के साथ समझौते का काम सौंपा और मौके का फायदा अमरसिंह ने अपने बिजनेस को जमाने में किया। 1988 में वीरबहादुर बिदा हुए तब तक अमरसिंह करोडपति बन चुके थे। कांग्रेस में थे तब उनकी मुलाकात माधवराव सिंधिया से हुई। माधवराव 1990 में क्रिकेट बोर्ड के प्रमुख पद से चुनाव लडे थे और उनके प्रतिद्वंदी जगमोहन दालमिया थे। उस वक्त अमरसिंह ने माधवराव को समर्थन दिया और माधवराव एक मत से जीत गये थे। इस अहेसान का बदला माधवराव ने उन्हें ओल इन्डिया कांग्रेस कमिटी में शामिल करवाकर चुकाया। 1990 में मुलायम सिंह यादव का उदय हुआ उसके साथ ही अमरसिंह ने उनके साथ अपने संबंधो को मजबूत बनाना शुरु किया और मुलायम ने जब नई पार्टी की रचना की तब वे मुलायम के साथ जुड गये। तब से अमरसिंह मुलायम के साथ ही है। अमरसिंह का व्यक्तित्व विवादास्पद है और वे सतत विवाद खडा करते रहते है। गुजरात के जमाई अमरसिंह का बॉलीवुड में जोरदार संपर्क है और बच्चन खानदान एवं अनिल अंबानी परिवार के साथ उनकी मित्रता चर्चास्पद है।
दिल्ली में आतंकवादियों ने सिरियल बम ब्लास्ट किये उसके बाद दिल्ली पुलिस जामियानगर में आतंकवादियों की खोज में गई थी और वहां आतंकवादियों ने पुलिस पर गोलीबारी शुरु कर दी और उसमें दो आतंकवादी मारे गए। मोहनचंद शर्मा नामक पुलिस के एक इन्स्पेक्टर भी शहीद हो गये। दूसरे दो आतंकवादी पकडे गये और अभी वे दोनों दिल्ली पुलिस की हिरासत में है। यह कहने की जरुरत नहीं कि, दिल्ली में मारे गए दो आतंकवादी और पकडे गये दोनों आतंकवादी मुस्लिम थे।
दिल्ली में जो एन्काउन्टर हुआ वो नकली था ऐसा हंगामा दंभी सांप्रदायिकों की जमात ने उसी दिन से शुरु कर दी थी। हमारे यहां कुछेक टीवी चैनल वाले भी इस जमात के दलाल के रूप में कार्य करते है और उन चैनलों ने कही से दो-चार लोगों को पकड कर कैमेरे के सामने खडा कर दिया और इन लोगों ने कह दिया कि एन्काउन्टर नकली था। चैनलों को ऐसा ही चाहिए था और उन्होंने राई का पहाड बना दिया। और इस हंगामे का लाभ उठा जामिया मिलिया के वाइस चान्सलर ने घोषणा कर दी कि जो दो आतंकवादी पकडे गये है उनके कानूनी सहाय का तमाम खर्च युनिवर्सिटी उठायेगी।
इस देश में राजनेताओं की एक ऐसी भी जमात है जो ऐसे मौके के इंतजार में पलक पांवडे बिछाये बैठी होती है। ऐसा कुछ हो तब इनके मुंह में मुस्लिम मतबैंक का शहद टपकने लगता है। टीवी चैनलों ने शुरु किया इसलिए यह राजनेता भी कूद पडे। मायावती इसमें सबसे आगे थी। मायावती मुस्लिम वोटों के लिए कुछ भी कर सकती है और इसलिए वे इसमें शामिल हो यह समझा जा सकता है लेकिन उनके पीछे-पीछे कुछेक कांग्रेसी भी इसमें शामिल हो गये। दिग्विजयसिंह, अर्जुनसिंह इत्यादि इस जमात के बेजोड नमूने है और उन्होंने यह झंडा उठा लिया। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार है और दिल्ली में कानून-व्यवस्था बरकरार रखने की जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की है इसके बावजूद यह कांग्रेसी अपना ड्रामा कर रहे है जो आघातजनक है।
मुलायम और अमरसिंह मुस्लिम वोटबैंक के राजनीतिक चैम्पियन है लेकिन फिलहाल उनकी पार्टी केन्द्र में कांग्रेस को समर्थन दे रही है इसलिए यह लोग खुलकर बाहर नहीं आते थे और अबु असीम आजमी जैसे टट्टुओं को आगे कर बाजी खेलते थे लेकिन कांग्रेसियों को खुलेआम उनकी सरकार के खिलाफ बोलते देखने के बाद कांग्रेस को अहेसास हुआ कि हम शर्म में रह गये और दूसरा इसका फायदा उठा गया। उन्होंने सोचा कि अभी बाजी हाथ से नहीं गई है ऐसा समझकर अभी बाकी रही कसर पूरी करना चाहते हो इस तरह लडाई शुरु कर दी। और इस लडाई के जुनून में अमरसिंह अपना विवेक भी भूल गये और एकदम गद्दारी की हद पर उतर आये है।
अमरसिंह ने जामियानगर के एन्काउन्टर को तो नकली कहा है उसके साथ मोहनचंद शर्मा की शहादत पर भी प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। पुलिस नकली एन्काउन्टर कर सकती है लेकिन क्या कोई पुलिसवाला ऐसे नकली एन्काउन्टर में अपनी जान दे सकता है ? और यह सवाल असली या नकली एन्काउन्टर का नहीं है लेकिन हमारे राजनेता कितनी हद तक गिर सकते है उसका सुबूत है। अमरसिंह की पार्टी इस देश की सरकार को समर्थन देती है और ऐसे लोग ही ऐसी बातें करते है यह बडे अफसोस की बात है। अमरसिंह को तो सामने मुस्लिम वोटबैंक दिख रही है इसलिए उन्हें वे क्या कह रहे है उसकी जरा सी भी परवाह नहीं है लेकिन जो लोग अपनी जान की बाजी लगाकर इस देश के लिए लड रहे है उन पर क्या बीत रही होगी इसका विचार करना चाहिए। अमरसिंह की बयानबाजी सुनने के बाद कौन पुलिसवाला आतंकवाद के खिलाफ लडने के लिए तैयार होगा ? आप अपने दो-पांच प्रतिशत मुस्लिम वोटबैंक के लिए एक जांबाज के शहादत की कीमत कोडी की कर दो तो इस देश के लिए लडने हेतु कौन आगे आयेगा। अमरसिंह के बयान पर इस देश में बैठे लोगों ने चुप्पी साधी है यह देख कर मुझे बहुत दु:ख हो रहा है। अमरसिंह ने तो इस मामले केन्द्र में से अपना समर्थन वापिस लेने की धमकी भी दे दी है। कांग्रेस के सत्यदेव चर्तुवेदी जैसे इके-दुके नेता अमरसिंह के इस ड्रामे पर बोले तो अमरसिंह ने बडी बदतमीजी के साथ चिरकूट जैसे विशेषणों का इस्तेमाल कर उनका अपमान किया इसके बाद भी कांग्रेसी दिग्गज चुप्पी साधे है। वास्तव में कांग्रेस को अपनी गर्जना सुनानी चाहिए और अमरसिंह को साफ शब्दों में कह देना चाहिए कि वे अपनी जुबान को लगाम दे और यह समर्थन वापिस लेने की धमकी बंद करे। दिल्ली में जामियानगर में जो हुआ वह नकली एन्काउन्टर नहीं था और इसकी नैतिक जिम्मेदारी कांग्रेस की है। कांग्रेस को इसकी जिम्मेदारी ले खुलेआम बाहर आना चाहिए और अमरसिंह को उसकी औकात बता देनी चाहिए। कांग्रेस को अमरसिंह जैसे लोगों को उसकी हेसियत का अहसास तो कराना ही चाहिए लेकिन इससे पहले जो लोग कांग्रेस में होने के बावजूद सरकार के साथ खडे रहने की जिनकी ताकत नहीं है उन्हें भगा देना चाहिए। जबकि कांग्रेस में यह नैतिक हिम्मत होती तो आज यह दिन देखना नहीं पडता। यह घटना कांग्रेस के लिए एक सबक है। आलम यह है कि गुजरात में हुए आतंकवादियों के एन्काउन्टर के मामले हंगामा मचाने वाली कांग्रेस को अभी अमरसिंह मंडली उनकी ही दवा का डोज उन्हें पीला रही है और कांग्रेस को यह एन्काउन्टर नकली नहीं था ऐसा कह अपना बचाव करना पड रहा है। इसे हम क्या कहें?
जय हिंद

गत २६ सितम्बर को बिलासपुर में प्रेस क्लब की ओर से "Youth vision 2020" का कार्यक्रम रखा गया था. इसमें भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही तरफ से लोगों को आमंत्रित किया गया था. इसी क्रम में यूथ कांग्रेस के नेता रोहित शर्मा जी को भी कार्यक्रम के एक दिन पहले दूरभाष पर बात करके विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था.
श्री रोहित शर्मा ने बहुत मेहनत कर और रिसर्च कर बिंदु इक्ट्ठे किये थे. अगले दिन कार्यक्रम स्थल पर जो हुआ उसने पूरे छत्तीसगढ़ को शर्म सार कर दिया .
भाजपा की तरफ से जितने लोग आये थे सबको भाषण देने दिया गया और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को एक एक करके पहले क्रम में नीचे किया गया और फिर सबके नाम काटने लग गए. रोहित जी का भी कार्यक्रम के प्रारंभ में पहला नंबर था जो की हर बार एक क्रम नीचे कर दिया जा रहा था और उनको झुटा भरोसा दिलाया जा रहा था की उनको बाद में बुलाया जायेगा. जब कार्यक्रम का अंत समीप आया तो रोहित जी ने उनको न बुलाये जाने का विरोध किया. इस पर उनका नाम पुकार कर उनको स्टेज पर बुलाया गया. जैसे ही रोहित जी स्टेज पर पहुंचे, उसी क्षण आयोजकों ने मुख्यमंत्री रमन सिंह का भी नाम पुकार लिया की रमन सिंह अब इस कार्यक्रम का समापन भाषण दे.

रोहित शर्मा जी ने उनके साथ इस तरह से किये जा रहे अपमान का स्टेज पर से कडा विरोध किया. उन्होंने कहा की वे प्रेस क्लब के न्योते पर आये हैं, अपनी बेइज्जती करवाने के लिए नहीं. उनको बोलने का हक है इसलिए उनको उनकी बात रखने का मौका मिलना चाहिए. इसपर मुख्यमंत्री के सुरक्षा कर्मियों ने रोहित जी को चारों तरफ से घेर लिया, उनके हाथ पकड़ लिए और मुख्यमंत्री के गनमैन ने अपनी बन्दूक तानते हुए, बन्दूक की नोक पर उनसे स्टेज से नीचे उतरने को कहा. इसके बाद मजबूरन रोहित शर्मा जी को बिना अपनी बात रखे स्टेज से नीचे उतरना पड़ा.

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ़ हो गयी है की भाजपा सरकार चुनाव को लेकर अत्यंत भयभीत है. सरकार को समझ में आ गया है की पिछले पांच वर्षों में उन्होंने प्रदेश का सिर्फ शोषण किया है. जनता के खून पसीने की कमाई से दिए गए कर को अपने विकास में उपयोग किया है. इस कार्यक्रम में भी मुख्यमंत्री को यह भय इस कदर सता रहा था की यदि कांग्रेस एवं अन्य संगठनों से आये युवाओं को बोलने का मौका दिया गया तो वे सरकार का कच्चा चिट्टा जनता के सामने खोल देंगे. इसलिए प्रदेश के मुख्यमंत्री ने योजनाबद्द तरीके से केवल भाजपाई युवाओं से भाषण दिलवाया और बाकी सभी युवा नेताओं को बुला कर उनकी इस तरह से उपेक्षा की. किसी भी प्रदेश के लिए इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या हो सकती है .


वैसे यह पूरा घटनाक्रम होने के बाद कार्यक्रम में मौजूद जनता को भी सारा माजरा समझ में आ गया . रोहित शर्मा जी के स्टेज से उतरने के बाद, रोहित जी के समर्थन में और उनके साथ किये गए दुर्व्यवहार के विरोध में करीब १५०-२०० लोगों ने कार्यक्रम का बहिष्कार किया . एक मुख्यमंत्री के लिए इससे ज्यादा "embarrassing" क्षण क्या हो सकता है की जैसे ही वो अपना संबोधन शुरू करे, इतना बड़ी जनता का ग्रुप उसका बहिष्कार करे.
बहरहाल भाजपा को अब समझ में आ जाना चाहिए की वो इतनी आसानी से अब हमारे प्रदेश की जनता को बेवकूफ नहीं बना सकती. आने वाले चुनाव में जनता भाजपा सरकार को उसके द्वारा किये गए शोषण के लिए करार जवाब देगी .

सावधान आप देख रहे है मुर्दो का देश,लडखडाता हुआ लोकतंत्र,और आस्था का खंडहर ।ठीक आपके सामने धांसु पोस्ट लेकर खडे है हमारे रिपोर्टर ।उनका कहना है कि पृथ्वी पर दुसरे ग्रह के प्राणी हमला करने वाले है ।अब आप डर रहे है। क्या कहा नही !!तो डरिये अपने अंदर भय ,रहस्य और रोमांच पैदा किजिये।क्यो?क्योकि रिपोर्टर ऐसा चाहता है फ़िर बेकग्राउंड म्युजीक भी वैसा बजाया जा रहा है।

अभी-अभी उस एलीयन ने हमारे रिपोर्टर से टेलीपैथी के जरिये दो घंटे बात की है वो हमे जिंदा नही छोडेंगे क्योकि वो भारत को खाना चाहते है ।आज हमारे सबसे तेज चेनल ने आपको भारत का अंत दिखाया है और उन्हे नाकाम करने की मुहीम भी हमने चालु कर दी है । हमारी पहल से सारा अमला जाग गया है ।सारे नेता और सारे अफ़सर जी जान से जुटे है हम भी पुरे मन से कोशीश कर रहे है सब मिलकर इस देश को खा रहे है वो आये इससे पहले हम इस देश को खाकर खतम कर देंगे।ना रहे बांस ना बजे बांसुरी।

अभी बाकी है आतंकवादियो की सरकार को धमकी और दिल्ली ब्लास्ट मे जलता हुआ आदमी ।आप कही जाइयेगा नही हम अभी हाजिर होते है एक छोटे से ब्रेक के बाद।टाटा नमक देश का नमक और नैनो कार पर ममता का वार के विज्ञापन के बाद लिजिये हम फ़िर हाजिर है आतंकवादियो की धमकियो के साथ ।इस खौफ़नाक खेल की कहा बनी थी योजना,क्या कर रही थी पुलीस आप के ऐसे सारे सवाल आप हमे एस एम एस करे हमारा नं है ०००००।

अभी-अभी हमे एक एस एम एस आया है उनका कहना है कि आप ऐसे आतंकवादियो को टी.वी.पर क्यो दिखाते हो ऐसा करके क्या आप आतंकवादियो की मदद नही करते?क्या इससे खौफ़ नही बढता?उन्होने बडे सही सवाल किये है इसलिये उनका मेसेज हमने डीलीट कर दिया है ,हमारी टी.आर पी. बढ रही है इसे बढने दिजीये ,हम सच बेच रहे है और बेचते रहेंगे॥आप कही जाईये गा नही हम दंगो की एक्सक्लुसीव तस्वीरो के साथ अभी हाजिर होंगे छोटे दिखने वाले बडे से ब्रेक के बाद।

देखीये ब्लास्ट मे जलता हुआ इंसान आग की लपटो के कारण यह पता नही चल पा रहा है कि ये हिन्दु है या मुसलमान।मगर यह साफ़ दिख रहा है कि यह एक इंसान है हमारा सवाल है कि इस आग को बुझायेगा कौन?हम नही बुझा सकते क्योकि अगर हमने यह बुझा दिया तो ब्रेकींग न्युज के साथ हमारी टी आर पी गिर जायेगी ।हमारा सारा श्रम टी आर पी खडा करने मे है मानवता को गिर जाने दिजीये टी आप पी खडी रहने दिजिये।आइये लोगो से पुछते है इस आग को बुझायेगा कौन ,आप देख सकते है लोग कैसे आक्रोशीत है मंत्री के मुर्दाबाद के नारे लगाये जा रहे है ये लोग मंत्री का इंतजार कर रहे है कि कब मंत्री जी आये और इस आग को बुझाये।अभी-अभी खबर मिली है कि मंत्री जी ने इस आग को बुझाने के लिये सरकारी अमला फ़ौरन रवाना किया है यह अमला सरकारी कागजो के सरकारी रफ़्तार से घटनास्थल की ओर बढ रहा है ।

ताजा घटनाक्रम मे यह जानकारी मिली है कि यह व्यक्ती आखिरकर जलकर मर गया जैसा आप देख सकते है और इसके मरने के बाद सरकारी अमला यहा पहुंचा है।इस देश का सरकारी तंत्र कब सुधरेगा इसकी मौत की जिम्मेदारी किसकी ।अब मुर्दे के शरीर पर पानी डालकर ये देश का पानी क्यो बर्बाद कर रहे है सेव वाटर वाटर इज प्रेसीयश ।आप अपनी राय हमे एस एम एस करे हमरा नं है ०००००।

कुवैत से मै दीपक शर्मा कैमेरामेन के बगैर बकबक न्युज कल तक

दीपक शर्मा

Wednesday, September 24, 2008

हमको नेता बनना है

Posted by दीपक

छ्त्तीसगढ के चुनावी खबर को आँखे गडाकर पी जाने के बाद अचानक ब्रेनवेव आने लगा ,तरह-तरह के ख्यालात दिमाग मे आते रहे।उसमे से एक खयाल दिमाग की खुँटी से ऐसा लटका कि उसे निकालने के लिये ब्लाग की पेंचीस चलानी पड गयी।वह खयाल था नेता बनने का ।फ़ुर्ती के साथ रात मे बैठ कर भाषण लिखा सुबह होते ही कुछ भाषण सुनने वाले लोग ढुंढे और एक चबुतरे के उपर सनलाइट के नीचे नेता-नेता का खेल शुरु हो गया ।मेरा हाथ छुडाकर भागती हिम्मत का हाथ मैने जोर से पकडा और अविलंब बोलना शुरु किया ।

मेरे भोले-भाले छ्त्तीसगढी भाइयो और बहनो राजनिती के इस अखाडे मे हर चुनाव मे आप अपनी आस्था और विश्वास की विजयमाला एक के गले मे डालते हो और हर पांच साल बाद उसकी नालायकी से तंगा कर वही माला उसके गले से निकालकर दुसरे के गले मे डाल देते हो और नो आपशन होने के कारण यह माला सिर्फ़ दो गलो मे नाचती रहती है ।आपकी इस समस्या को हल करने के लिये लिजिये हमारा तीसरा गला प्रस्तुत है।इस बार आप यह निर्माल्य हमे अर्पित करे और गंगा कसम हम बहुत कुछ बदल देंगे क्योकि हमारी रणनिती ही ऐसी रहेगी कि चित भी अपनी पट भी अपनी और अंटा अपने बाप का ।
हम एक बात शुरु से ही स्पष्ट कर दे कि हमारी रुची मुफ़्त के चावल तेल और नमक बांटने की कदापि नही है ।आप मुफ़्त का चावल खाते है और उसे खाकर आपलोगो का हाजमा बिगड जाता है फ़िर आपको अनाप-शनाप मांगो के कैं दस्त होने लगते है ।आप मांगने लगते है बेरोजगारी भत्ता बढाओ ।आप ही बताइये भला ये भी कोई मांग हुयी ,कहिये की रोजगार बढाओ और आप कहते है बेरोजगारी भत्ता बढाओ याने कि बेरोजगार बढाओ ।इसिलिये हम मुफ़्तखोरी की आदत को बढावा ना देते हुये आपको काम देंगे ज्यादा से ज्यादा काम और आपको सब कुछ मिलेगा मगर पसीने की किमत पर।मुफ़्त आपको मिलनी चाहिये शिक्षा क्योकि शिक्षा लोकतंत्र का आधार है और यहा आलम ये है कि अपनी आधी आबादी अनपढ है फ़िर लोकतंत्र का दिया यहा कैसे जलेगा । और हमारी अभिलाषा आलु-गोभी की तरह शिक्षाकर्मी भरती करने की भी नही है क्योकि हम मानते है शिक्षा और शिक्षक समाज का आधार होते है इसिलिये उसके स्तर को बनाये रखने के लिये आई.ए.एस. के स्तर की परीक्षा लेकर शिक्षक का चयन किया जायेगा उन्हे काम भी ज्यादा दिया जायेगा और तन्खवाह भी तब मास्टरगिरी को फ़िर से सम्मान मिलेगा और अमेरीका को सेवा दे रहे हमारे भारतीय प्रतिभाशाली लोग देश का रुख करेंगे ।

हमारा पुरा इरादा राजनिती के पुरे प्रोफ़ार्मे को सुधारने का भी है इसिलिये अगर हमारी सरकार आ गयी तब हम सबसे पहला काम यही करेंगे कि चमचागिरी को राष्ट्रीय अपराध घोषित कर दिया जायेगा, नेताओ को आटो मे आने-जाने की आज्ञा दे दी जायेगी और इसके दुरगामी परिणाम होंगे अब आप कहेंगे आटो के कारण उन्हे नियत जगहो पहुंचने मे विलंब होगा तो मै आपसे पुछता हुँ कि अभी लालबत्ती कार होकर भी कौन सा वो समय पर उपस्थित हो रहे है ,दंगा फ़साद वाली जगहो मे ये अपना स्वार्थ साधने मौके पर पहुंच जाते है और वहा का माहौल खराब कर देते है आटो से जाया करेंगे तो देर से पहुचेंगे और मामला बिना विवाद के रफ़ा-दफ़ा हो जायेगा ।आटो मे आने जाने से देश का कुछ तेल तो बचेगा ।वैसे भी तेल दिनो-दिन महंगा होता जा रहा है और नेता दिनो-दिन सस्ते इसिलिये अब तेल बचाना ज्यादा जरुरी है ।फ़िर ये भाषण पे भाषण पेल कर देश की हवा खराब कर देते है इसिलिये पांच साल मे इन्हे सिर्फ़ पैतालीस भाषण करने की आजादी रहेगी ।आरक्षण वाले नेताओ को पचास की पात्रता होगी । तब ये सोच-समझकर बोला करेंगे अभी तो फ़रमाते रहते है कि नक्सलीयो को लोकतंत्र की मुख्यधारा से जोडा जाये उन्हे बैलेट की शक्ती समझनी चाहिये वैगेरह ।देश के वीर जवान सीमा पर नक्सलीयो से लडते है सीने मे गोली खाते है और ये भाषण छोडते रह्ते है इसके समाधान के लिये हमने एक रास्ता खोजा है नेता का एक परिजन सेना मे होगा और उसकी पोस्टींग बार्डर मे होगी जब नक्सली की एक बुलेट उसके परिजन के जिस्म को छुकर निकलेगी और अपना खुन बहेगा तब ससुरा सारा बेलेट भाग जायेगा और यही चिल्लाने लगेगा बुलेट का जवाब बुलेट से । इन जैसे को हम ऐसे ही नियम बनाकर ठीक कर देंगे इनके भरोसे चले तो ससुरे सारे चंबल के डाकु मंत्री बन जाये।लोकतंत्र है इसलिये हम अपने विरोधियो को विरोध करने का पुरा मौका देंगे खुद आटो मे घुमेंगे पर उन्हे हेलीकाप्टर लाकर देंगे।ना ना आप खुश ना हो हम बडे दरियादिल नही बहुत बडे कुटनितीज्ञ है ,छ्त्तीसगढ का इतिहास रहा है कि हेलीकाप्टर या तो पहाड से टकराकर टुट गया है या कही जाकर गुम गया है सो इसी अनुभव के भरोसे हम एक बार मे किस्सा ही खतम कर देंगे।

हम यह भी महसुस करते है कि आटोमेटीक प्रमोशन ने हमारे अफ़सरो को काफ़ी सुस्त और आरामतलब बना दिया है इसिलिये इस पद्धती को बदल कर हर अफ़सर को १०० गाँव दे दिये जायेंगे और गांव की उन्नती के आधार पर उनका मानदेय घटता और बढता रहेगा ।इन्हे विदेश तो हम कत‍इ नही जाने देंगे ।हमारे देश मे अच्छे अफ़सरो की कमी है क्या? जो इन्हे कुछ सीखने विदेश जाना होगा ।मगर बेचारे क्या करे लोकतंत्र की दुर्घटना ने किसी अंगुठा छाप को कही का मुख्यमंत्री बना दिया और इनके चमकिले हस्ताक्षर अंगुठे के निशान के नीचे दब गये।हम ऐसी दुर्घटना यहा नही चाहते इसिलिये किरण बेदी जैसे अफ़सरो को यहा बुलाकर अपना ज्ञान और साहस बढाते रहेंगे भई जिसने नो पार्किंग से इंदिरा गांधी की कार हटा दी उसमे कुछ बात तो होगी तो उस और उस जैसी सारी बात का फ़ायदा हम उठायेंगे।स्वास्थ्य और कानुन की दलाली बंद करवा दी जायेगी ।डाक्टर और वकिल सरकारी मुलाजीम माने जायेंगे और उन्हे निजी प्रेक्टीस की अनुमति नही होगी ।डाक्टर और वकिल को परीक्षा पास करते ही मानदेय मिलने शुरु हो जायेंगे ।झुठ बोलने वाले वकिल और अपनी तोंद बाहर लटकाकर घुमने वाले डाकटर की डिग्री छीन ली जायेगी ।आप ही कहिये जिस से अपनी तोंद नही सम्हलती वो दुसरे का मोटापा क्या खाक कम करेंगे ।मुजरिमो से ब्लाग लिखवाया जायेगा ससुरा सारा ध्यान ब्लाग मे रहेगा तो अपराध कम हो जायेंगे ।

हम साहित्य और हिन्दी के प्रसार मे भी जोर देगे मगर हिन्दी बचाओ समिती के सारे सदस्य को अंग्रेजी जानना आवश्यक होगा ।अब आप कहेंगे क्यो ? तो वो इसलिये कि जब आपको फ़र्राटेदार अंग्रेजी और हिन्दी दोनो आयेगी तब आप कहेंगे कि मुझे दोनो भाषा आती है मगर मुझे हिन्दी श्रेष्ठ लगती है तब इस बात का वजन रहेगा और लोग आपसे सहमत होंगे ।अभी हालात ऐसे है कि आपको हिन्दी छोड कुछ और आता नही तो आप अपनी कमजोरी छुपाने हिन्दी बचाओ हिन्दी बचाओ चिल्लाते फ़िरते है ।ऐसे नियम बनाने से भीड हटेगी और हिन्दी बगैर बचाये ही बच जायेगी।

भाषण लंबा हो रहा है इसलिये इस ट्रेलर पर भरोसा करके आप मुझे जीताइये और मै आपको पुरी पिक्चर दिखाउंगा । हमने अब लोगो की तरफ़ देखा भीड काफ़ी बढ गयी थी हम ताली की आशा कर रहे थे मगर अंडे टमाटर बरसने लगे ।भीड से एक चिल्लाया ये तो तानाशाही है। हमने कहा हा हम तानाशाही करके लोकतांत्रीक काम करने का माद्दा रखते है यहा तो बाकी लोग लोकतंत्र के सहारे तानाशाही कर रहे है ।उन्हे जो कुछ बरसाना था उन्होने बरसा दिया हम उसे बिनकर बाजार मे बेच आये कुछ रुपये इकठ्ठे हो गये ।

मिडील क्लास आदमी होने के कारण पांच हजार से उपर की गिनती मुझे नही आती इसलिये हमने योजना बना ली है कि बिना पैसे खर्च करे चुनाव लडेंगे कोयले से सारी दिवालो पर अपने नारे लिख देंगे सुबह से अपनी साइकिल लेकर जनसंपर्क किया करेंगे।आलु टमाटर के कुछ पैसे मिले है उससे सफ़ेद रंग खरीद लेंगे और शहर और गाव की सारी भैसो के पीठ पर अपना संदेश गोद देंगे जब केटवाक करते पुरा ट्रेफ़ीक जाम करके ये अपनी पुंछ हिलायेगी तो अपना इलेक्शन केंपेन हो जायेगा । भैसे अगर कम पडी तो कुछ
भैसें ताउ से उधार ले लेंगे । इस ईमानदारी से हम अगर चुनाव जीते तभी हम ईमानदारी से काम कर सकेंगे और अगर हार गये तो कौन सा अपना पैसा जा रहा है ।रह गया सवाल नाक का तो अपनी नाक छिपकली के दुम की तरह है कुछ दिनो मे फ़िर उग आयेगी।

चित्र साभार त्रयंबक जी के ब्लाग से
दीपक शर्मा

Thursday, September 18, 2008

बिना नाक वाले पाटिल

Posted by Jayshree varma

गलियां जहां विरान और मोहल्ला है सुनसानजिन्दा इंसानों की बस्तियां बन गई शमशानकहीं आंख में नमीं थी, कहीं अश्क बही थीहूकुमत के आगे आज आम इंसान परेशानशैतानी बस्तियों से आया था कोई हैवानभारत की रानी हो गई फिर से लहूलुहानभोर में ना कोई शंख बजा ना शाम को आजानलहू बहा जिन धर्मों का रंग था उनका एक समानदेश ने हाल के वर्षों में सिलसिलेवार बम धमाके झेले हैं। जयपुर, बंगलुरु, अहमदाबाद और अब दिल्ली। आतंकवादी हमलों के मद्देनजर सरकार की ओर से कोई मुक्कमल तैयारी नहीं दिख रही जो लगातार हो रहे धमाकों से पता चलता है। पांच दिन बीतने के बावजूद अब तक कोई सुराग नहीं मिल पाया है। सियासत कमान्डो के बीच सुरक्षित है, आम आदमी के जान की किसी को कोई परवाह नहीं है। मैं पूछती हूं कि क्या आम आदमी का लहू इतना सस्ता है? अभी जो तमाशा हो रहा है और जांच का नाटक खेला जा रहा है कुछ दिन बाद सब भुला दिया जायेगा। और इस आंतरिक सुरक्षा की नाकामी को देखते हुए पाटिल पर निशाना लाजिमी है। जिसे सरकार ने गंभीरता से लिया। बम ब्लास्ट गंभीर समस्या है। ऐसे गंभीर मसले पर चर्चा में पाटिल को शामिल नहीं किया गया। यही नहीं, उस बैठक में कई मंत्रियों ने उनकी कार्यशैली पर नाखुशी जताई। इससे पहले भी लालू यादव उनकी शिकायत सोनिया गांधी से कर चुके हैं। आतंकवाद के प्रति इस सुस्त नजरिये का संप्रग को अगले चुनाव में खामियाजा भुगतना पड सकता है। लिहाजा सत्ता के गलियारे में पाटिल की विदाई के कयास लगाए जा रहे हैं। इससे बडा अपमान क्या हो सकता है ! इनकी जगह कोई ओर होता तो कब का इस्तीफा दे चुका होता। लेकिन बिना नाक वाले पाटिल को कोई फर्क नहीं पडता। इन्हें तो चुल्लु भर पानी में डूब मरना चाहिए। इन्हें मान-अपमान की जरा सी भी परवाह नहीं है। कांग्रेस अगर वास्तव में पाटिल को गृहमंत्री पद से हटाना चाहती है तो यह इस देश पर बहुत बडा उपकार होगा।शिवराज पाटिल एक असफल गृहमंत्री है। 2004 में इनके गृहमंत्री बनने के बाद ही देश में सबसे अधिक आतंकवादी हमले हुए है। 2004 से लेकर अब तक 12 जितने आतंकवादी हमले हुए है जबकि छोटे आतंकवादी हमलों की तो कोई गिनती ही नहीं हो सकती। शिवराज पाटिल के कार्यकाल से आतंकवाद देश के कोने-कोने में पहुंच गया। उनके कार्यकाल के दौरान हुए बडे हमलों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश का एक भी बडा शहर आतंकवादी हमले से अछूता नहीं रहा। पाटिल मंत्रालय की सबसे बडी असफलता यह है कि सुरक्षा एजेंसी पूरी तरह विफल गई और एक भी हमले की इन सुरक्षा एजेंसियों को कानो-कान खबर नहीं हुई। इससे भी बडी असफलता तो यह है कि, अब तक उन जिम्मेदार लोगों को ढूंढने में वे सफल नहीं हो पाये। संसद पर 2001 में हुए हमले के केस में जिसे फांसी की सजा हुई है उस अफजल गुरु को फांसी देने में जो विलंब हो रहा है उसका जिम्मेदार भी पाटिल मंत्रालय ही है। डॉ। कलाम ने अफजल के फांसी की फाइल को 2003 में ही गृह मंत्रालय को भेज दिया था लेकिन उस फाइल को दबा दिया गया है जिसके जिम्मेदार पाटिल ही है।सवाल केवल उनकी अकर्मण्यता का नहीं है। उनके ड्रेस सेंस का जो विवरण है वह बेहद चौंकाने वाला है। शनिवार को विस्फोट से पहले कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में वह गुलाबी सूट में थे, विस्फोट के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए काले सूट में, और रात में घायलों को देखने जाते समय झक सफेद सूट में। नफासत बुरी चीज नहीं है, लेकिन त्रासवादियों के बीच यह आपकी संवेदनहीनता का भी सूचक है। जिस पर गृह सचिव यह कहकर जले में नमक छिडक रहे हैं कि हर हमले के बाद अनुभव बढता है। क्या आतंकवाद कोई प्रयोगशाला है, जिसमें हर हमले से सरकार सीख रही हैं? अपनी छवि की खास परवाह करने वाले गृहमंत्री अगर आतंकवाद को निर्मूल करने के बारे में भी सोचते, तो आज उनकी इतनी किरकिरी नहीं हो रही होती। अपने लिबास की उन्हें जितनी चिंता है, देश की सुरक्षा व्यवस्था की उतनी क्यों नहीं? यह हमारी सुरक्षा क्या खाक करेंगे। जिसकी किमत जनता अपनी जान गंवाकर चुका रही है।पाटिल की असफलताओं का ग्राफ बहुत बडा है लेकिन दिल्ली ब्लास्ट के बाद वे सबके आंख में किरकिरी बन गए है। कांग्रेस में ही उन्हें हटाने के लिए माहौल बना हुआ है जिसके चलते यह फैसला जल्द से जल्द हो जाना चाहिए और इन्हें घर रवाना कर देना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री की देश को कोई जरूरत नहीं है।हमारे देश का गृहमंत्री कैसा होना चाहिए? जिसमें एक आग हो। जो ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता हो। पाटिल जैसा गृहमंत्री बिलकुल नहीं चलेगा। फीके-फीके मनमोहन सिंह को कडा रवैया अपनाना चाहिए। ऐसे गृहमंत्री को लात मार कर भगा देना चाहिए।इस देश की राजनीति के आगे मेरी बौनी सी कलम कुछ भी नहीं है, लेकिन ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसकी चोट ज्यादा है और किसकी कम है। ये राजनेताओं के छिपे खेल तो दब जायेंगे लेकिन मेरी कलम में अंगारों से भरी स्याही कभी नहीं सुखेगी।देश के सियासत में ऊंचे तख्त पर भेडिये ही भेडिये बिराजमान है। बात पगडी और टोपी की है। मेरी बोली कडवी जरुर है लेकिन यह समय की जरूरत है। राष्ट्र प्रेम और राष्ट्रद्रोह की जंग जारी है। ये तो वक्त ही बतलायेगा कि किसको विजय मिलेगी।
न दोष किसी के देखो, न पोल किसी का खोलो...
स्वतंत्र के देश के नौजवानों, गांधी जी की जय बोलो...
जय हिंद
jayshree varma

Monday, September 15, 2008

राजिम कुंभ -आखो देखी

Posted by दीपक

प्लांट मे काम कम होने पर अक्सर मै सरकारी बाबु की तरह उंघने का काम छोडकर अपनी यादो को टटोलने का काम करता हुँ। इन्ही यादो को टटोलकर मैने एक पोस्ट राजिम कुंभ पर तैय्यार की थी जिस दिन मैने इसे पोस्ट करना चाहा उसी दिन संजीत जी ने यह खबर सुना दी कि सावधान बॄजमोहन अग्रवाल भी ब्लागींग मे आ जमे है इतना सुनते ही इस छ्त्तीसगढी की मुखरता तत्काल मौन हो गयी फ़िर अनिल जी को याद करके उनकी हिम्मत के सदके हमने ये पोस्ट ठेल दी है ।पुरा का पुरा सच है॥वैसे भी जिसके पास साहस ना हो उसे लेखन,राजनिति और धर्म विथीका मे कदम नही रखना चाहिये ।

राजिम कुंभ" -आँखो देखी

एक राजा था ।अनेक मंत्री थे।छोटा सा राज्य था ।राज्य की सत्ता राजा के हाथो मे थी।
एक दिन राजा को सनक चढी कि क्यो ना राजिम कुंभ का आयोजन किया जाये?फ़ुर्ती के साथ मंत्रीमंडल की बैठक ली गयी ,राजा ने अपनी राजिम कुंभ की इच्छा जाहिर की ,सभी मंत्रीयो ने वाहवाही के पुल बांधने के साथ हामी भर दी।उनकी अदृश्य दुम हिलने लगी जिसे राजा के दिव्य चक्षुओ ने देख लिया फ़िर राजा ने सभी की पीठ थपथपायी।

रातो रात राज्य मे ढिंढोरा पिट दिया गया ।राजिम कुंभ नामक एक अनुठे, नवीन लोकोत्सव का भव्य आयोजन किया जा रहा है ।मैने जैसे ही कुंभ की आवज सुनी तुरंत यह खबर मेरे मित्र के कानो मे ठेल दी उसने मुझे आश्चर्य भरी नजरो से देखा !!और कहने लगा यह कुंभ तो धन्वंतरी की गलती का परिणाम है उसने अमृत की चार बुंदे जहा-जहा छलकायी वही कुंभ का आयोजन होता है इसमे राजिम का नाम कब से जुड गया । मैने कहा आज ही ।
उसने प्रतिप्रश्न किया "फ़िर राजिम लोचन महोत्सव का क्या?"।
मैने कहा यार तुम भी निहायत ही भोंदु हो यह "इस राजिमलोचन महोत्सव ही की प्लास्टीक सर्जरी कर के उसे राजिमकुंभ का चेहरा दिया जा रहा है ।
पर सर्जरी के लिये तो डाक्टर की आवश्यकता होगी?उसने दुसरा प्रश्न दागा।
मैने कहा-अपने राजा डाक्टर नही है क्या ,विशुद्ध आयुर्वेदाचार्य है ,देखना इस प्राचीन विद्या का उपयोग कर कैसे राजिमलोचन महोत्सव को राजिम कुंभ मे बदलते है।
उसने फ़िर अगला प्रश्न दागा -आयोजन होना कठिन है क्योकि इस आयोजन मे साधु-संत तो आने से रहे ,तुम तो जानते हो साधु संत तो शास्त्र सम्मत चलते है और शास्त्रो मे राजिमकुंभ का वर्णन नही है इसिलिये वो इस कुंभ मे भाग नही लेंगे।
मैने मुस्कराते हुये कहा -लगता है तुम्हे घर से बाहर की कोई खबर ही नही रहती ।राजा हरे लाल नोटो का बंडल लेकर साधुओ के पास गये थे उन्होने इस माया को लात मार दी पर शायद लात ठीक से लगी नही इसिलिये सारे नोट जाकर साधु के कमंडल मे गिर गये ।फ़िर क्या हुआ मेरे मित्र ने उत्सुक होकर पुछा । फ़िर चमत्कार हुआ !कमंडल से आकाशवाणी हुयी कि साधु राजा के साथ जाकर राजिम कुंभ का अनुष्ठान करे उपयुक्त तिथी मे वहा अमृत वर्षा होगी ।अब मेरे मित्र के प्रश्न समाप्त हो गये थे उसने मुझे कुछ देर एकटक देखा फ़िर कहा- तो राजिम कुंभ देखने चलेंगे ! मैने कहा अवश्य चलेंगे ।

नियततिथी पर राजिम कुंभ चालु हो गया मै और मेरे मित्र सजधज कर रजिम कुंभ की ओर चल पडे मैने मित्र से पुछा सबसे पहले क्या देखने की ईच्छा है ,उसने कहा जिस कुंभ के कारण इतना हो हल्ला है चलो उसी कुंभ के दर्शन कर आते है,दोनो कुंभ के समिप पहुचे कुंभ क्या था बगौना था ,आकार मे बडा तो वह था ही नही ।छोटे और मध्यम आकार के बीच कही उसकी जगह थी उसे देखकर लगता था पंद्रह-बीस भैसे एक साथ उस मे नहा सकती है।उसके अस्तित्व की रक्षा के लिये रेत भरी सीमेंट की बोरिया उसके चारो ओर पहरेदारी कर रही थी ।मित्र ने कुंभ देखा और तनिक हास्यपुर्ण मुद्रा मे कहा ये है कुंभ?मैने कहा यही है कुंभ तुम्हे पता है इसे पंद्रहलाख रु. से अधिक लागत से बनाया गया है ।उसने फ़ुर्ती से जवाब दिया -इसे देखकर भ्रष्टाचार की बु आ रही है । मैने उसे समझाते हुये कहा बडे शक्की हो यार -ये बताओ ये कुंभ किसके लिये बना है जनता के लिये ना अर्थात यह सरकारी संपत्ती है ना ,अब सरकारी संपत्ती तो आपकी अपनी है ,आप लोगो ने उसमे से अपना हिस्सा ले लिया तो इसमे बुरा मानने जैसी क्या बात ? अब की वह चुप हो गया हम आगे बढ गये सहसा कानो मे एक गीत सुनाई दिया "टुरा न‍इ जानै रे न‍इ जानै"।दोनो उसी गीत की ओर लपक लिये देखा उंचे मंच के उपर कुछ लोग उंची कुर्सी मे बैठे थे,उनके नीचे कुछ लोग कुर्सी मे बैठे थे और उनके पिछे कुछ लोग रेत मे खडे थे और गीत का मजा ले रहे थे ।मित्र ने हमेशा की तरह प्रश्न दागा ये थ्री केटिगीरी का क्या मतलब।मैने कहा देखो वो जो सबसे उपर बैठे है वो श्री श्री श्री १००८ सनकनंदन भगवान है।पर ये तो नंगे दिख रहे है-उसने कहा?मैने जवाब दिया-खामोश वे भगवान है।
फ़िर इस तीन-तीन श्री की क्या जरुरत ।मैने कहा-देखो हम जैसे रेत मे खडे नारकिय प्राणी के पास तो एक भी श्री उपलब्ध नही,परंतु कुर्सी मे जमे इन मंत्रियो और अफ़सर के पास एक श्री होता है ,क्योकि वे सबसे बडे है इसिलिये उनके पास तीन श्री है और वे भगवान है ।फ़िर इस १००८ का क्या मतलब?-उसने पुछा।बडा सिधा सा मतलब है कि १००८ दफ़े उनकी भगवान से मीटिंग हो चुकी है।
हमारे बीच ये बाते चल ही रही थी कि अचानक देखा "टुरा न‍इ जाने"के गीत पर तीन श्री वाले एक साधु जमकर नाचने लगे ।मित्र ने फ़ौरन प्रश्न दागा -अब इसे क्या हुआ?मैने कहा चेतना का विस्तार ।उसने कहा- मतलब।मैने कहा -मतलब के जब कोई सोमरस के सौतेले भाइ गांजा का अदिक सेवन कर लेता है तो चेतना इसी स्थिती मे आ जाती है और उन्हे हर जगह भगवान दिखने लगते है ।अब इन्हे भगवान दिख रहे है चाहे आप भांगडा ,गरबा या कुछ और भी बजाते तब भी ये नाचते ये गाड से उनकी १००९ वी मुलाकत है ।मित्र ने कहा ये तो गंजेडी लगता है । मैने कहा चुप ये भगवान है ,और उसका हाथ पकडकर उसे दुसरी दिशा मे ले आया ।कुछ दुर जाने पर हम लोगो ने देखा ब्युटीफ़ुल भक्तो की भिड के साथ वंडरफ़ुल साधुओ की बारात आ रही है ।कुछ साधुओ ने लंगोट पहना है,कुछ ने वह भी उतार दिया है,किसी ने हनुमान का रुप धरा है गदा हाथ मे लिये है ।सहसा कुछ कोलाहाल सुनाइ दिया पास जाकर देखा दो साधु एक दुसरे की गरदन पकडे है प्राणांत करने के लिये ।मित्र ने कहा अखाडे का प्रदर्शन हो रहा है । मैने कहा नही लडायी हो रही है।क्यो?।मैने कहा ये दो अलग-अलग अखाडे के साधु है,इस बात पर लडायी हो रही है कि पहले किसका अखाडा स्नान करेगा ।ये तीन श्री वाले भगवान अकसर इसी बात पर लडते है कि किसकी कुर्सी याने आसन उंचा होगा,कौन पहले नहायेगा इत्यादि। मित्र ने कहा चलो उन्हे रोकते है वरना व एक-दुसरे को मार डालेंगे।मैने कहा यह भुल कभी ना करना ,वो ठहरे तीन-तीन श्री वाले हम अदने से श्री विहीन लोग उन्हे समझाने के लिये कम से कम एक श्री वाला व्यक्ती तो चाहिये।इधर-उधर नजर दौडायी देखा सामने से एक रौबदार आदमी आ रहा है मैने कहा "काखर होइहै बज्र शरीरा कौन बोहही लंका के बिडा "देखो राजिम कुंभ रुपी लंका का भार उठाने वाले संस्कृती मंत्री आ रहे है इनके पास दो श्री है एक हमेशा अदृश्य रहता है।राजा अग्रसेन जी के रिश्तेदार है ,पिछले बीस दिनो से यहा जमे हुये है ये भी साल मे एक बार ही राजिम मे दर्शन देते है,फ़िर अगले साल तक के लिये अंतर्ध्यान हो जाते है ।उन्होने आते ही दोनो साधुओ से माफ़ी मांगी चमत्कार हुआ और साधु मान गये ।अब देखने को कुछ खास नही था इसिलिये हम आगे निकल गये ।आगे जाकर खबर सुनी कि राजिम कुंभ की यज्ञ वेदी से वेद प्रवीण ,वेद ज्ञाता,वेदांती प्रगट हुये है ।हम भी उनके दर्शनार्थ दौडे सामने उनका प्रवचन चल रहा था ,हम सुन रहे थे सहसा उनके वचन हमे समझ आने बंद हो गये । मित्र ने कहा देखो ये किसी को गाली दे रहा है मैने कहा नही मुर्ख यह गाली नही यही तो अमृत है ।भुल गये आकशवाणी ने क्या कहा था -अमृत की वर्षा होगी ,देखो कैसे अमृत झर रहे है।

मित्र ने कहा यह पाखण्ड है ।मैने कहा घोर पाखण्ड है और इसे अंजाम दे रहे सारे पढे-लिखे अनपढ लोग ।इन्हे इतनी छोटी सी बात समझ मे नही आती कि चित्त निर्मल हो जाने पर तो महावीर की तरह नग्न खडा हुआ जा सकता है परंतु मात्र नंगा हो जाने से तो कोई महावीर नही हो जाता ।

दीपक शर्मा


एक क्रिकेट प्रेमी और भूतपूर्व खिलाड़ी होने के नाते, मुझे खुशी है की हमारा छत्तीसगढ़ भी अब विश्व क्रिकेट में एक अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब होगा... बशर्ते, खिलाड़ियों को पुरी सुविधाएँ मिले और खेल का सही विकास हो, गुणवत्ता का पुरा ध्यान रखा जाए और जितनी जल्दी हो सके 'छत्तीसगढ़ क्रिकेट बोर्ड' का गठन कर उसे 'भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड' से मान्यता दिलाई जाए।

अगर सही तरीके से और हर सम्भव प्रयास कर क्रिकेट को राज्य में सही दिशा देने की कोशिश की जाए और मुलभुत सुविधाएँ प्रदान किया जाए तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे इस छोटे से राज्य से भी 'धोनी', 'पठान', 'रैना' और 'प्रवीण कुमार' जैसे खिलाड़ी हमारे देश का प्रतिनिधित्व करेंगे। हमारे राज्य में प्रतिभाओं की कमी नही है... जरुरत है तो उन प्रतिभाओं को खोज निकलने और हर सम्भव मदद कर उन्हें मुलभुत सुविधाएं प्रदान करने की। क्रिकेट ही क्यों, अगर सुविधाएं और सही प्लेटफॉर्म मिले तो हमारे राज्य से कई दुसरे और अविकसित एवं अप्रचलित खेलों में भी प्रतिभाएं देश का प्रतिनिधित्व कर नाम रोशन कर सकती है।

चलिए, अब मुद्दे पे आते हैं...
११ सितम्बर, २००८ को राजधानी रायपुर से करीब २४ किमी दूर, ग्राम परसदा में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम का उद्घाटन हुआ और शायद, राज्य में क्रिकेट का नया अध्याय शुरू हो गया। अंतरराष्ट्रीय ख्याति वाले कई खिलाड़ियों के कदम पहली बार रायपुर में पड़े। स्टेडियम का उद्घाटन राज्यपाल ईएसएल नरसिंहन ने स्टेडियम के सामने लगे पत्थर से पर्दा हटाकर अनावरण करके किया। मैंने किसी अखबार में पढ़ा: "मुख्यमंत्री ने अपने संक्षिप्त संबोधन में लोगों को स्टेडियम के लिए बधाई दी और कहा कि स्टेडियम को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से जल्द संबद्धता मिलने की उम्मीद है। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैच हो सकेंगे। खेल मंत्री श्री अग्रवाल ने कहा कि अब कोई यह नहीं कह सकेगा कि राज्य में क्रिकेट के लिए अंतरराष्ट्र्रीय स्तर की सुविधा नहीं है।"

क्या स्टेडियम का निर्माण और बीसीसीआई से संबद्धता ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर की सुविधा देना है? एक आधे अधूरे स्टेडियम का लोकार्पण करवा देने से ही खेलों का विकास नही हो जाता है। खेलमंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने पत्रकारों को एक सवाल के जवाब में यह कहकर दरकिनार कर दिया कि 'खेलने के लिए सबसे जरुरी मैदान होता है और वह तैयार है' और 'पत्रकार सिर्फ़ सवाल पूछता है, बहस नही करता'।

मैदान का तैयार हो जाना ही सब कुछ है? अभी स्टेडियम में इतना काम बाकी है की उसे पुरा होने में लगभग एक वर्ष का समय लग जाएगा। स्टेडियम में इंटीरियर और फिनिशिंग के साथ साथ पेवेलियन, वी आई पी और मिडिया गैलरी का पुरा काम अभी बाकी है। चित्र में स्टेडियम को ध्यान से देखने से साफ़ ज़ाहिर होता है की सिर्फ़ मैदान और अन्दर में गैलरी को छोड़कर बाकी कुछ भी काम नही हुआ है और स्टेडियम को पुरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय खेलों के लिए बीसीसीआई को सुपुर्द करने में आने वाला एक साल भी कम पड़ जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों के लिए सिर्फ़ स्टेडियम ही काफ़ी नही है। अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों एवं अधिकारियों के ठहरने की सुविधायों के साथ साथ, आईसीसी और बीसीसीआई के मापदंडों पर खरा उतरना और दर्शको के लिए मुलभुत सुविधायों का ख्याल रखना भी जरुरी है। छत्तीसगढ़ का यह पहला अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम होने के साथ साथ हमारे राज्य से सटे हुए दुसरे राज्यों के दर्शकों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है।

भाजपा नेताओं का अचानक यह क्रिकेट प्रेम वैसे कुछ संदेहास्पद और अजीब है। अचानक, आनन् फानन में स्टेडियम का उद्घाटन कर देना, वह भी आधे अधूरे स्टेडियम को, मुझे सोचने पे मजबूर कर देता है। स्टेडियम की समूची लागत ९८.४५ करोड़ रुपए है जिसमें से ख़ुद खेलमंत्री के मुताबिक अभी तक 60 करोड़ खर्च हुए हैं, मतलब ३८.४५ करोड़ रुपए का काम अभी बाकी है... आप इसी बात से अंदाजा लगा सकते हैं की अभी स्टेडियम के पुरा होने में कितना वक्त बाकी है।

शायद 'चुनाव आचार संहिता' लागु होने से पहले ही लोकार्पण करने एवं सरकार एवं उसके मंत्रियों द्वारा इसे अपनी उपलब्धि बताने की पीछे भी एक रहस्य छुपा है. शायद भाजपाई मंत्रियों एवं नेताओं को यह डर लगने लगा है की कहीं आने वाले विधानसभा चुनाव में हार का सामना न करना पड़े. बल्कि उन्हें अब यह लगने लगा है की '३ रु. किलो चावल' एवं 'स्व-घोषित विकास', सरकारी तंत्र एवं सरकार द्वारा किये गए अनगिनत भ्रष्टाचार के सामने कमजोर पड़ गए हैं तथा उनकी हार अब सु:निश्चित है.
इसी कारण से एवं इस डर से की कहीं शिलालेख पर "उनकी" जगह, इस अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम के वास्तविक प्रणेता एवं भूतपूर्व मुख्यमंत्री, श्री अजित जोगीजी - जिनकी दूरदर्शिता, रजनीतिक सोच एवं व्यावसायिक समझ ने इस स्टेडियम को जन्म दिया - का नाम अंकित ना हो जाये, इस भ्रष्टाचारी भाजपाई सरकार ने सारी वर्तमान परिस्थितियों को ताक़ में रखते हुए इस स्टेडियम का लोकार्पण कर दिया.
मुझे तो यह लगता है की कहीं यह भ्रष्टाचारी सरकार, आनन्-फानन में इस अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम का नामकरण कर इसका नाम - "पं. दीनदयाल उपाध्याय अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम" या फिर "डॉ. श्यामा प्रसाद मुख़र्जी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम" ना कर दे...

खैर, देर से ही सही, भाजपाइयों को वास्तविक परिस्थितियों की समझ तो आई!

बहरहाल, हमारे भोले-भाले प्रदेशवासियों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम देखने एवं अपने चहेते खिलाडियों से तथा उनके खेल से भविष्य में रूबरू होने का मौका मिलने पर हार्दिक बधाई एवं श्री अजीत जोगीजी को साधुवाद!

- Remmish Gupta

Thursday, September 11, 2008

आम आदमी -एक मानसिकता

Posted by Rebellious Indians

"एक आम आदमी" बहुतेरे भारतीयो का परिचय इसी ब्रह्मवाक्य से होता है।यह आम आदमी आम है क्योकि उसे अपने आम होने से घृणा है और खास होने से प्यार ।मै अभी अपनी नयी टेबल पर बैठकर जब आम आदमी के उपर लिखकर कागज रंगने की कोशीश कर रहा हु तब भी आम से खास बनने की यह भावना ही बलवती है और जब आम आदमीयो के बीच बैठा एक आम आदमी चीखकर कहता है कि वह एक आम आदमी है तब भी वह प्रयास कर रहा है खास होने के ,बस यह थोडा छोटा प्रयास है और कूछ नही ।

अपनी छोटी-छोटी उपलब्धी को बडा दिखाने और बडी-बडी अशक्तता को छोटा दिखाने मे यह चश्मा बडा कारगर सिद्ध होता है मसलन- "मै एक आम आदमी हु मैने हाकरी करके पढाई की अब प्रोफ़ेसर हो गया हुँ अब मेरी तारीफ़ होनी ही चाहिये"या "मै जानता हु रिश्वत देना अच्छा नही पर देता हु आम आदमी कर भी क्या सकता है"इत्यादि।

आम आदमी आम दिखता है पर अंगुर दिखना चाहता है ,अंगुर भी कोई नही आम आदमी का ही एक गुच्छा है जो सत्ता के गलियारे से होता हुआ राजनितीज्ञ,उद्योगपति,शिक्षाविद इत्यादि के लेबल अपने खीसे मे भरकर दिल्ली मे जा बैठा है । आम को अंगुर होने की हडबडी है पर यह नेति-नेति जैसा पेचीदा रास्ता है।इसके लिये चमचागिरी की तपस्या ,शब्दो की लफ़्फ़ाजी और बैंक बेलेंस की हरियाली वगैरह आवश्यक है ।आम आदमी वगैरह का इंतजाम तो भली-भांती कर लेता है पर बाकी औजारो का क्या? उसके पास ये औजार नही है इसिलिये तो वह आम आदमी है ,तब अंगुर दुर होने लगते है और अंगुर होने की संभावना भी विदा मांगने लगती है ।यहा अंगुर दुर हुये नही और वहा आमआदमी उसे खट्टा मान लेता है ।फ़िर शुरु होता है इन खट्टे अंगुरो की आलोचोनाओ का दौर तथा उन आलोचनाओ के फ़ायदे का दौर ।इन आलोचनाओ के शार्टकट रास्ते भी अंगुरो की तरफ़ जाने के मुख्य रास्तो से जुडे होते है यथा यदि आपकी आलोचना से डरकर दिल्ली के किसी अंगुर ने आपसे अपनी सहमती जतायी तो दुसरे दिन आपकी फ़ोटो उसके साथ अखबारो मे चमकने लगेगी और आम से तुरंत अंगुर हो गये।हर्रा लगे ना फ़िटकरी और रंग चोखा ।और यदि वे सहमत ना हुये तो असहमत हो जायेंगे जिसकी संभावना अधिक है और असहमत अंगुर जब आप पर कटाक्ष करे तो भी वह आपको अपनी बराबरी का तो मान ही रहा है, आप तुरंत उसकी बराबरी के हो गये अर्थात आप को भी अंगुर होने की मान्यता मिल गयी ।फ़र्क मात्र इतना ही होगा कि अधिक खट्टे अंगुरो के बीच आप कुछ कम खट्टे नजर आयेंगे ।

विनम्रता आम आदमी का गहना है वह हमेशा झुका हुआ है ,्हमेशा नम्र है ,हमेशा विनीत है जैसे उसकी रीड की हड्डी हो ही नही । अंगुर महंगाई बढायेगा और आम झुक जायेगा ,अंगुर करोडो रुपये डकार जायेगा और आम !आम और झुक जायेगा ।अगर कभी अंगुर आम को देखकर मुस्करा दे आम अब की बारी झुकेगा नही बिछ जायेगा क्योकि आम के पास रीड की हड्डी ही नही है ।रीड की हड्डी तो छोडिये आम आदमी के पास कंधा भी नही इसलिये तो वह अपनी कुछ जिम्मेदारी उठाने को वह तैय्यार नही ।अपना कुछ बोझ पुलिस, कुछ बोझ पत्रकार,कुछ बोझ समाजसेवी और दौलतमंदो तथा बाकी का बोझ दिल्ली के अंगुरो पर डालकर वह मजे से सोता रहता है।

हर चुनाव मे जब अंगुर अपने भाषण और नारो के जाम लेकर आम की बस्ती मे जाता है तो वह अंगुर के चरण पुजने लगता है और भुल जाता है कि यह वक्त चरण पुजने का नही लात मारने का है ।मारो लात और अंगुर को आम करो, सभी को आम करो।

भारत आम लोगो का देश है इसिलिये लडखडा रहा है और इसे टिकने के लिये कंधा चाहिये इसिलिये आम आदमी को अपना कंधा बनाना ही होगा नही तो यह देश लडखडाकर गिर पडेगा आम आदमीयो के उपर ही ।मगर अफ़सोस लाखो आम आदमी अंगुर को आम बनाने की फ़िक्र छोड अंगुरो के पिछे घुम रहे है अंगुर बनने की आश लिये ।


मैने तो अंगुर लिखा है लेकिन यदि आप चाहे तो लंगुर भी पढ सकते है साथ ही समीर यादव जी को धन्यवाद जिनके कारण इस लेख के बीज मेरे मानस मे अंकुरित हुये है।

दीपक शर्मा

छत्तीसगढ़ भाजपा सरकार में एक और बड़ा घोटाला. ऐसा प्रतीत होता है कि यह सरकार घोटालों की बादशाह है . इस सनसनीखेज खबर को दैनिक भास्कर में दो दिन पहले प्रकाशित किया गया है जिसका हाइपर लिंक है :
http://www.bhaskar.com/2008/09/06/0809061140_fraud_recruitment.html

विस्तृत खबर इस प्रकार है :

रायपुर. राजधानी से 130 किमी दूर मैनपुर ब्लाक में डेढ़ साल पहले हुई शिक्षाकर्मी भर्ती में बड़ा गोलमाल उजागर हुआ है। इससे पंचायत और शिक्षा विभाग में हलचल मच गई है।

2006-07 में ब्लाक के स्कूलों में 178 शिक्षाकर्मियों की भर्ती को मंजूरी दी गई थी। इतने तो भर्ती हुए ही, पंचायत और शिक्षा अफसरों ने मिलकर 47 अतिरिक्त शिक्षाकर्मी भर्ती कर दिए। प्रारंभिक जांच के दौरान इस मामले में लेनदेन के संकेत भी मिले हैं।

रायपुर जिला पंचायत के सीईओ आईएएस अमित कटारिया ने इस मामले की जांच के आदेश दिए हैं। पंचायत और शिक्षा अफसरों को ही इस काम में लगाया गया है। शुरुआती तहकीकात में कई हैरतअंगेज बातें सामने आई हैं। अंदेशा है कि बड़े रैकेट ने यह कारनामा अंजाम दिया। इसमें पंचायत और शिक्षा विभाग के कुछ अफसरों की लिप्तता के संकेत मिले हैं।

सूत्रों ने बताया कि जिन 47 लोगों को शिक्षाकर्मी बनाया गया, सभी पहली सूची जारी होने के बाद वेटिंग लिस्ट में रखे गए थे। पहले 178 पद भरे गए, फिर एक-एक कर वेटिंग वालों को पदस्थापना दी जाती रही। प्रक्रिया विकासखंड मुख्यालय से पूरी की गई। कारनामा इतनी सफाई से किया गया कि मुख्यालय के अफसरों को भनक तक नहीं लगी। यही वजह है कि फर्जी नियुक्ति पाने वालों को भी नियमित वेतन मिलने लगा। सारे लोग अभी नौकरी में हैं।

राज्यपाल का फर्जी प्रमाणपत्र : पहले मंजूर 178 पदों पर हुई भर्ती भी जांच के दायरे में है। बताते हैं कि जितने लोग भर्ती हुए, उनमें से 80 फीसदी के प्रमाणपत्र फर्जी हैं। इन्होंने स्काउट गाइड के प्रमाणपत्र पेश किए हैं। सभी में राज्यपाल के दस्तखत हैं। इन प्रमाणपत्रों के नंबर प्राप्तांक में जोड़े गए हैं। आधे से ज्यादा प्रमाणपत्र 1992 से 2004 के बीच 12 सालों के हैं।

दिलचस्प बात ये है कि राज्यपाल के सभी दस्तखत एक जैसे हैं। छत्तीसगढ़ और अविभाजित मध्यप्रदेश में उक्त अवधि में कोई भी राज्यपाल 12 साल नहीं रहे। यही नहीं, खेलकूद के ज्यादातर सर्टीफिकेट भी एक जैसे हैं। इनमें एक ही अफसर के दस्तखत हैं, केवल वर्ष का अंतर है। अनुभव प्रमाणपत्र जनभागीदारी द्वारा संचालित प्राइमरी स्कूलों के हैं जबकि जनभागीदारी से प्राइमरी स्कूल का संचालन ही नहीं होता।

कैसे फूटा फर्जीवाड़ा : मैनपुर ब्लाक में शिक्षाकर्मी भर्ती अरसे से विवादों में है। ज्यादातर नौकरी ब्लाक के ग्राम अमलीपदर, भेजीपदर और बोहरापदर के लोगों को दी गई। इसे लेकर वहां हंगामा भी हुआ लेकिन रायपुर तक बात नहीं आई। बाद में कुछ लोगों ने मुख्यालय में शिकायत की। जब लगातार शिकायतें मिलने लगीं, तब अफसरों के कान खड़े हुए। श्री कटारिया ने जिला पंचायत में पदभार संभालने के फौरन बाद मामले की जांच के आदेश दिए। शुरू में केवल फर्जी प्रमाणपत्र जांचे जा रहे थे। जांच में ही पता चला कि मंजूर पदों से ज्यादा को नौकरी दी गई।

7 शिक्षाकर्मी बर्खास्त : जिला पंचायत ने अभनपुर ब्लाक के 7 शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त कर दिया है। पीतांबर लोधी, भोलाराम साहू, तिजऊराम तारक, जितेंद्र जाट, परमेंद्र कुमार और तीजन डहरिया ने अनुभव, खेल और बीएड का फर्जी प्रमाणपत्र पेश करके नौकरी हासिल की थी। बताते हैं कि इनमें ज्यादातर ने 1990-92 के बीच हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास की लेकिन दस साल बाद (2001) का खेलकूद प्रमाणपत्र पेश किया। ग्रेजुएशन 1995-96 में किया लेकिन बीएड का प्रमाणपत्र 1994 का है।

जांच में कई गड़बड़ियां सामने आई हैं। इसमें कुछ अफसर-कर्मचारियों की लिप्तता का शक है। इन्हें बख्शा नहीं जाएगा। पूरी भर्ती निरस्त की जा सकती है।
-अमित कटारिया, सीईओ, जिला पंचायत रायपुर

Saturday, September 6, 2008

मैकबैथी प्रयासों को उजागर करें

Posted by Sanjeeva Tiwari

चिट्ठाजगत

भारत में व्याप्त वर्तमान भ्रष्टाचार पर चर्चा आजकल हर जगह होने लगा है, लोग आहें भर रहे हैं पर यह सुरसा की भांति अपना मुंह योजनों योजन फैलाते जा रहा है । सरकारी सेवक व राजनैतिज्ञ मिलजुल कर अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कुटिलतम चाल चल रहे हैं और अनैतिक तरीके से बेदम धन उगाही कर रहे हैं । इन सब का प्रभाव व पीडा जनता भुगत रही है, मानवता को जार जार रोना पड रहा है । एक तरफ दाने दाने को मुहताज गरीब जनता है जिसे अपनी सही स्थिति सरकारी खातों में दर्ज कराने के लिए भी भष्टाचारियों को चारा डालना पड रहा है वहीं धन्ना सेठों का नाम इस सूची में दर्ज हो रहा है ताकि सरकारी योजनाओं का जमकर दोहन किया जा सके ।

विगत माहों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक भ्रष्ट देशों की सर्वेक्षण सूची जब आई तो देश के लगभग सभी समाचार पत्रों के संपादकीय पेजों पर इस संबंध में विचारकों के लेख नजर आये अभी कुछ दिनों पूर्व ही सीएमएस ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के द्वारा वर्ष 2007 की सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी की गई है । यह रिपोर्ट बीपीएल परिवारों और ग्यारह आधारभूत सेवाओं के क्रियान्वयन के अध्ययन पर आधारित थी । इसका सार यह था कि भारत में संचालित कल्याण योजनाओं की सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए एक तिहाई गरीबों को रिश्वरत देनी होती है ।

छत्तीसगढ में पूर्व प्रधान मंत्री भारत रत्न राजीव गांधी के आदिवासी अंचलों में प्रवास की चर्चा जब भी होती है तब तब उनका यह कथन भी याद किया जाता है कि सरकार द्वारा प्रेषित सौ रूपये आदिवासियों तक मात्र अट्ठारह ही पहुंच पाते हैं । यह बात हमारे अतिभ्रष्ट सिस्टम के सच को उजागर करती है । इसमें सरकारी कर्मचारियों एवं राजनैतिज्ञों की सांठ गांठ सर्वविदित है । ऐसे कई उद्धरण हैं जिसे समय समय पर लिखकर, पढकर व सुनाकर हम अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं या यूं कहें कि इस महा दानव के सामने हाथ मलते और सिर धुनते हैं ।

राजनैतिक महत्वाकांक्षा के कारण हो रहे भष्टाचार एवं अनैतिक हथकंडों को उजागर करने के लिये बरसों पहले एक चरित्र को प्रस्तुत किया गया था उस शख्श नें हमें राजनैतिक भ्रष्टाचारिता के पहलुओं से परिचय कराया था । कालांतर में प्रतिनायकों के या खलनायकों के चरित्र को आदर्श मानने वालों नें इससे सीख ग्रहण किया कि धन व शक्ति मैकबैथी तरीकों से प्राप्त की जाती है । मैकबैथ विश्व के सामने सर्वप्रथम जन सामान्य के हृदय में नायकों पर केन्द्रित नाटकों के मिथक को तोडते हुए अपनी कहानी में प्रस्तुत हुआ था (हो सकता है कि इसके पूर्व भी कोई साहित्य उपलब्ध हो किन्तु हमें अंग्रेजी साहित्य की ज्यादा समझ नहीं है)


वर्तमान परिस्थिति में मैकबैथ हर जगह जीवंत है, राजनीति के लिए मैकबैथ कृति ही नहीं गीता का रूप ले रही है । इसके अंत से शिक्षा चाहे जो मिलती हो पर आज राजनीति में इसके अंतिम शिक्षा को छोडकर बाकी सब अनुकरणीय माना जा रहा है ।

चाटुकारिता, संप्रभु सत्ता की प्राप्ति के लिये कुटिल राजनैतिक दांवपेंच फिर सत्ता व शक्ति को सतत बनाये रखने, अपनी विलासिता व हर प्रकार की वासना की भूख को शांत करने के लिये अपनाये जाने वाले अनाचार व अत्याचार की कुत्सित कडियों पे कडियां राजनीति के आवश्यक अंग हो गए है । इन महापातकीय कृत्यों के दागों को खादी के धवल वस्रों में छिपाने व अंग अंग में व्याप्त पाप के सडांध दुर्गंध को दबाने के लिये अब सिर्फ अरब सागर जितने इत्र से काम नहीं चलने वाला अब तो संपूर्ण पृथ्वी के महासागरों जितना इत्र भी कम पडेगा ।

हिरणाकश्यपु, रावण व कंस ये सब इसी के उदाहरण हैं । आइये आलोचक सचिन अवस्थी जी के इस ब्लाग में राजनैतिक भ्रष्टाचारिता के ऐसे मैकबैथी पहलुओं पर चर्चा करें एवं इससे संबंधित विषयों पर अपना विचार यहां रखें ।

हम इस विषय पर अपना विचार प्रस्तुत करने वाले सभी साथियों का आहवान करते है कि वे इस ब्लाग में बतौर ब्लाग लेखक शामिल होवें एवं देश में यत्र तत्र सर्वत्र फैले इन मैकबैथों के चरित्रों से आस्था रूपी धूल को झाडे और उन्हें बेनकाब करें ।

संजीव तिवारी

Thursday, April 24, 2008

Corruption : Causes and Consequences

Posted by Rebellious Indians

For the last few years, the issue of corruption--the abuse of public office for private gain--has attracted renewed interest, both among academics and policymakers. There are a number of reasons why this topic has come under fresh scrutiny. Corruption scandals have toppled governments in both major industrial countries and developing countries. In the transition countries, the shift from command economies to free market economies has created massive opportunities for the appropriation of rents (that is, excessive profits) and has often been accompanied by a change from a well-organized system of corruption to a more chaotic and deleterious one. With the end of the cold war, donor countries have placed less emphasis on political considerations in allocating foreign aid among developing countries and have paid more attention to cases in which aid funds have been misused and have not reached the poor. And slow economic growth has persisted in many countries with malfunctioning institutions. This renewed interest has led to a new flurry of empirical research on the causes and consequences of corruption.



Economists know quite a bit about the causes and consequences of corruption. An important body of knowledge was acquired through theoretical research done in the 1970s by Jagdish Bhagwati, Anne Krueger, and Susan Rose-Ackerman, among others (Mauro, 1996). A key principle is that corruption can occur where rents exist--typically, as a result of government regulation--and public officials have discretion in allocating them. The classic example of a government restriction resulting in rents and rent-seeking behavior is that of an import quota and the associated licenses that civil servants give to those entrepreneurs willing to pay bribes.



More recently, researchers have begun to test some of these long-established theoretical hypotheses using new cross-country data. Indices produced by private rating agencies grade countries on their levels of corruption, typically using the replies to standardized questionnaires by consultants living in those countries. The replies are subjective, but the correlation between indices produced by different rating agencies is very high, suggesting that most observers more or less agree on how corrupt countries seem to be. The high prices paid to the rating agencies by their customers (usually multinational companies and international banks) constitute indirect evidence that the information is valuable. These indices are obviously imperfect owing to their subjective nature, but can yield useful insights.





Causes of corruption:


Since the ultimate source of rent-seeking behavior is the availability of rents, corruption is likely to occur where restrictions and government intervention lead to the presence of such excessive profits. Examples include trade restrictions (such as tariffs and import quotas), favoritist industrial policies (such as subsidies and tax deductions), price controls, multiple exchange rate practices and foreign exchange allocation schemes, and government-controlled provision of credit. Some rents may arise in the absence of government intervention, as in the case of natural resources, such as oil, whose supply is limited by nature and whose extraction cost is far lower than its market price. Since abnormal profits are available to those who extract oil, officials who allocate extraction rights are likely to be offered bribes. Finally, one would expect that corruption is more likely to take place when civil servants are paid very low wages and often must resort to collecting bribes in order to feed their families.



While all of the hypotheses described above are empirically testable, in the sense that data are available for that purpose, only a few have actually been tested. What empirical studies have been done support certain hypotheses: namely, that there is less corruption where there are fewer trade restrictions; where governments do not engage in favoritist industrial policies; and perhaps where natural resources are more abundant; and that there is somewhat less corruption where civil servants are paid better, compared with similarly qualified workers in the private sector (Van Rijckeghem and Weder, 1997).



Consequences of corruption:

From economic theory, one would expect corruption to reduce economic growth by lowering incentives to invest (for both domestic and foreign entrepreneurs). In cases where entrepreneurs are asked for bribes before enterprises can be started, or corrupt officials later request shares in the proceeds of their investments, corruption acts as a tax, though one of a particularly pernicious nature, given the need for secrecy and the uncertainty as to whether bribe takers will live up to their part of the bargain. Corruption could also be expected to reduce growth by lowering the quality of public infrastructure and services, decreasing tax revenue, causing talented people to engage in rent-seeking rather than productive activities, and distorting the composition of government expenditure. At the same time, there are some theoretical counterarguments. For example, it has been suggested that government employees who are allowed to exact bribes might work harder and that corruption might help entrepreneurs get around bureaucratic impediments.



One specific channel through which corruption may harm economic performance is by distorting the composition of government expenditure. Corrupt politicians may be expected to spend more public resources on those items on which it is easier to exact large bribes and keep them secret--for example, items produced in markets where the degree of competition is low and items whose value is difficult to monitor. Corrupt politicians might therefore be more inclined to spend on fighter aircraft and large-scale investment projects than on textbooks and teachers' salaries, even though the latter may promote economic growth to a greater extent than the former.



Empirical evidence based on cross-country comparisons does indeed suggest that corruption has large, adverse effects on private investment and economic growth. Regression analysis shows that a country that improves its standing on the corruption index from, say, 6 to 8 (0 being the most corrupt, 10 the least) will experience a 4 percentage point increase in its investment rate and a 0.5 percentage point increase in its annual per capita GDP growth rate (Mauro, 1996). These large effects suggest that policies to curb corruption could have significant payoffs. The association between corruption and low economic growth remains broadly unchanged when estimated for a group of countries with extensive red tape. Therefore, there is no support for the claim that corruption might be beneficial in the presence of a slow bureaucracy. The most important channel through which corruption reduces economic growth is by lowering private investment, which accounts for at least one-third of corruption's overall negative effects. At the same time, the remaining two-thirds of the overall negative effects of corruption on economic growth must be felt through other channels, including those mentioned above. While it is difficult to disentangle those other channels, there is some evidence that one of them--the distortion of government expenditure--plays a significant role.



Based on cross-country comparisons, it seems that corruption alters the composition of government expenditure: specifically, corrupt governments spend less on education and perhaps health, and probably more on public investment. Regression analysis shows that a country that improves its standing on the corruption index from 6 to 8 will typically raise its spending on education by 1/2 of 1 percent of GDP, a considerable impact. This result is a matter for concern, because there is increasing evidence that educational attainment fosters economic growth.



Of course, empirical results related to a phenomenon that is, by its very nature, difficult to measure must be treated with a high degree of caution. Two issues that merit special attention in this context are those of causality and the possible role of other forms of institutional inefficiency.



Why do countries judged to be corrupt experience slow economic growth? Is it that corruption harms growth or simply that low growth leads consultants to give bad corruption grades to a country? To deal with this issue, one can take variables (such as a country's colonial history or the extent to which its population is divided along ethnolinguistic lines) that happen to be correlated with corruption but have no effect on economic growth or government spending other than through their impact on the efficiency of institutions, and use them as instrumental variables in the regression analysis. Through this statistical trick, it is possible to get around problems relating to the subjectivity of the corruption indices, and it can be shown that corruption--together with other forms of institutional inefficiency--causes low economic growth.



Corruption is most prevalent where there are other forms of institutional inefficiency, such as political instability, bureaucratic red tape, and weak legislative and judicial systems. This raises the question of whether it can be established that corruption, rather than other factors correlated with it, is the cause of low economic growth. Regression analysis provides some evidence that if one controls for other forms of institutional inefficiency, such as political instability, corruption can still be shown to reduce growth. Nevertheless, it is hard to show conclusively that the cause of the problem is corruption alone, rather than the institutional weaknesses that are closely associated with it. The truth is that probably all of these weaknesses are intrinsically linked, in the sense that they feed upon each other (for example, red tape makes corruption possible, and corrupt bureaucrats may increase the extent of red tape so they can extract additional bribes) and that getting rid of corruption helps a country overcome other institutional weaknesses, just as reducing other institutional weaknesses helps it curb corruption.



Agenda for further research:

While there is a well-established body of theoretical knowledge, as well as some tentative results on the causes and consequences of corruption, several more questions need to be answered to enable governments to design effective policies aimed at curbing corruption.



If the costs of corruption are so high, why don't governments get rid of it? A possible answer is that once a corrupt system is in place, and a majority of people operate within that system, individuals have no incentive to try to change it or to refrain from taking part in it, even if everybody would be better off if corruption were to be eliminated.

Consider the following examples:



* You live in a society where everybody steals. Do you choose to steal? The probability that you will be caught is low, because the police are very busy chasing other thieves, and, even if you do get caught, the chances of your being punished severely for a crime that is so common are low. Therefore, you too steal. By contrast, if you live in a society where theft is rare, the chances of your being caught and punished are high, so you choose not to steal.



* You are a new junior civil servant in an administration where everybody, including your superiors, is very corrupt. Somebody offers you a bribe to help him avoid paying taxes. You decline the offer. A few hours later, you receive a telephone call from your boss, who would have liked a cut of your bribe. Your boss suggests that if you treat a friend nicely (by accepting the bribe), you may be promoted, while if you don't, you will be transferred to a remote provincial office. You then take the bribe and share it with your boss and colleagues. If, instead, the administration in which you work is very honest, you are likely to behave honestly to avoid the risk of being fired.



* Individuals A and B are members of the same government. Suppose, on the one hand, that A is very corrupt and has established a private bribe-collection system for her own gain. The need to pay substantial bribes reduces entrepreneurs' incentives to invest and imposes a significant burden on economic growth. Citizens realize that economic growth is being harmed by the corrupt government, though they may not know exactly who is soliciting bribes. Therefore, they decide not to reelect the government. This shortens B's horizon, making him more inclined to extract a large proportion of current output and to disregard any ensuing adverse effects on future output. In other words, B will seek to obtain a large slice of the cake today since he knows that the government that he participates in will soon be ousted. On the other hand, following a similar line of reasoning, if A does not collect bribes, then B will also refrain from doing so.



The last example may provide an explanation not only for the persistence of corruption but also for the empirical observation that, on average, countries that are more corrupt tend to be more politically unstable. It also suggests that both corruption and political instability may result from the failure of members of the same government or ruling elite to coordinate their actions. In that sense, corruption and political instability may be two sides of the same coin. This example may fit the cases of countries that are bedeviled by frequent coups whereby corrupt regimes succeed one another. At the same time, it does not explain a number of other relevant cases, such as those of dictators who have remained in power for many years by allowing their supporters to collect large bribes, or those of governments formed by groups of individuals who have been able to agree on bribe levels that are high, but not so high as to cause them to be ousted.



All of the above examples show that once corruption has become ingrained, it is very difficult to get rid of. As a result, corruption tends to persist, together with its adverse consequences. This leads to an important policy conclusion, which is consistent with international experience over the past few decades. Attempts to eliminate corruption tend to succeed when reforms are undertaken in a very sudden and forceful manner and are supported at the highest levels of government. However, an equally relevant question is what characteristics make countries more likely to fall into a high-corruption, low-growth trap.



Corruption breeds poverty, but does poverty breed corruption? One striking empirical finding is that poorer countries are usually considered to be more corrupt. This result must be treated with caution, since it may well be driven by the observers' perceptions. However, if one assumes for a moment that this finding reflects a genuine correlation, it may be useful to explore its sources. We have seen that there is evidence that corruption lowers economic growth, thereby breeding poverty over time. At the same time, poverty itself might cause corruption, perhaps because poor countries cannot devote sufficient resources to setting up and enforcing an effective legal framework, or because people in need are more likely to abandon their moral principles. Researchers have begun to analyze the link between civil servants' wages and the extent of corruption. It has been suggested that reasonable wages are a necessary condition for avoiding corruption, though not a sufficient one.



Which forms of corruption are worse? Available indices of corruption are general and do not distinguish between high-level corruption (such as kickbacks paid to a defense minister in exchange for his country's purchase of expensive jet fighter aircraft) and low-level corruption (such as petty bribes paid to a junior civil servant for expediting the issuance of a driver's license). Nor do they distinguish between well-organized corruption and chaotic corruption. (When corruption is well organized, the required amount and appropriate recipient of a bribe are well known, and payment guarantees that the desired favor will be obtained.) Therefore, we still do not know which kinds of corruption are more deleterious and should be tackled first. Country-specific studies and anecdotal evidence suggest that high-level and low-level corruption tend to coexist and reinforce each other. Thus, this distinction may not be relevant. On the other hand, the distinction between well-organized corruption and chaotic corruption may be more relevant, since a fairly convincing theoretical case can be made that the latter has worse effects than the former.



Under a well-organized system of corruption, entrepreneurs know whom they need to bribe and how much to offer them, and are confident that they will obtain the necessary permits for their firms. It has also been argued that well-organized corruption is less harmful because, under such a system, a corrupt bureaucrat will take a clearly defined share of a firm's profits, which gives him an interest in the success of the firm. In contrast, under chaotic corruption, entrepreneurs may need to bribe several officials, with no guarantee either that they will not face further demands for bribes or that the permits they seek will actually be delivered. In addition, if multiple agents request bribes from the same entrepreneur without coordinating bribe levels among themselves, they are likely to make excessive demands, with the result that entrepreneurial activity comes to a halt. While chaotic corruption seems a priori to be more deleterious than well-organized corruption, there is currently little empirical data available to test this hypothesis.



What is being done, and what else could be done? Many countries and institutions have paid increasing attention to the problem of corruption, and the debate on possible policy options is still ongoing. In deciding how to allocate aid funds, some donor countries have begun to give more importance to recipient countries' actions to curb corruption. Member countries of the Organization for Economic Cooperation and Development have acted to criminalize the bribery of foreign public officials. International institutions, which have always played an important role in reducing the scope for corruption, are now giving more prominence to the issue. For example, the IMF has always encouraged countries to liberalize their economies (for example, by eliminating trade restrictions), terminate off-budget operations, and ensure budget transparency. The guidelines on governance, which were approved by the IMF's Executive Board in August 1997, formalize the IMF staff's involvement in such tasks.



An example of the remaining challenges. One of the most difficult policy issues is how to prevent corruption from distorting government expenditure. This important issue goes to the heart of donors' concerns about the possible misuse of aid funds. Donors find it difficult to ensure that aid funds are spent wisely, because resources are fungible. For example, a donor may give aid funds to enable the recipient country to build a school, which the recipient may indeed use for that purpose; however, the availability of aid funds to build the school makes it possible for the recipient to use the resulting savings to buy sophisticated weapons, whose purchase may provide more scope for illegally diverting funds into individuals' pockets than school construction could. How should this problem be addressed? Clearly, donor countries should pay attention to the overall composition of government spending and not focus narrowly on how their own funds have been spent, but many donors may not have sufficient resources to do this. One possible approach that has been suggested is to have an international institution monitor the overall composition of government expenditure, as a service to both the recipient country's citizens and the donor community. This approach would not, however, be easy to implement. Recipient countries would probably resist attempts by the rest of the world to play a role in determining the composition of their public spending. In addition, as a practical matter, it may be difficult to ensure that spending items are not simply relabeled, with no real improvement in the composition of government expenditure.



How should policy effectiveness be assessed over the next decade? We have a reasonable theoretical understanding of the causes and consequences of corruption, and have begun to get a sense of the extent of these relationships through empirical research. A consensus is emerging that corruption is a serious problem, and several bodies in the international arena have begun to take policy measures to curb it. At the policy level, although we may still be at the stage of learning by doing, action is being taken. It is important to ensure that ten years from now, we can look back on today's focus on corruption and observe that some concrete results were attained in this domain. To that end, those bodies that are taking action against corruption ought to establish criteria to evaluate their policies. Each entity would need to devise its own evaluation criteria, and it should do that now, so that the effectiveness of its policies can be assessed accurately and fairly over the next decade.



The need to define "concrete results" might appear to be a tall order in an area where quantification is difficult. A place to begin, however, could be the well- established body of knowledge on the causes of corruption.

Where will corruption take India?

Posted by Rebellious Indians

The most disquieting aspect of the widespread corruption in India is the fact that it is not anymore confined to politicians or the government machinery alone. It is prevalent amongst almost every section of the society at every level.

As the practice of corruption is a dishonest act, one has to think that most of the Indians are dishonest, which could be different only in degree between the individuals. As the reason for the dishonesty is greediness and the desire to get things done at any cost one can think that most of the country men are greedy and do not anymore think that the means should justify the ends. This is not a flattering statement and many readers would desire that it would not be so and such statement could have been avoided. But, the fact is that most of the Indians are involved in corrupt practices in one way or the other, either due to greed or due to so called compulsion. In any case, the willingness to sacrifice for the sake of not getting involved in corrupt dealings is conspicuous by its absence amongst the most.

Today, if one would say that any particular Indian is honest to the core, it could only be a case of exception rather than a rule.

The study of world phenomenon on corruption has repeatedly branded India as one of the most corrupt countries in the world. Unfortunately, this view has not disturbed most of the Indians at all and they do not seem to care as to what others think of them; so long as the existing systems and practices would allow them to make money and get things done in one way or the other.

The irony is that India is still considered to be a very religious country and it is still widely believed that the religion is the basis of Indian life, thoughts and actions. This is obviously true, considering the fact that there are hundreds of temples, churches and mosques spread all over the country and they are all densely visited day in and day out by the feverishly praying Indians.

Is not religious ethos contrary to corruption and dishonest practices ?The unfortunate situation in India is that those who call themselves most religious are often found to have indulged themselves in dishonest practices on many occasions. Several of the religious centres, of all religions, are suspected to be steeped in nepotism, as such incidents have been repeatedly published in the press.

It does not shock Indians anymore to know that not only the politicians, ministers and IAS & IPS officers are corrupt but even the judges, professors, doctors and NGO organisations are.

Corruption is not only prevalent amongst rich who are greedy in spite of possessing enough but also prevalent amongst poor.

Now, what can be the future of the Indian society in such conditions? It can be only frustration, chaos, unrest and even bloodshed in the not too distant future. This kind of corruption in the national polity and public and private life cannot go on for ever, without disturbing the overall peace in the society. It is sad that those who are in charge of the nation today do not appear to realise this and still are merrily going ahead with their dealings unconcerned about the harm that it would inevitably do to the larger national cause.

What is very sad and extremely disquieting about this country is that Ministers suspected to be involved in murder. Chief ministers of swindling crores of public money, senior police officers of molestation charges are all living in comforts and enjoying positions, thus effectively exposing the fact that the crusade against corruption has finally failed in India.

Even as the vicious cycle of corruption would continue with one swindling the other, there could be a number of persons who would be left out of this cycle due to inefficiency or commitment to the cause of truth and such persons would be driven down to despair.

The incidents of history indicate that some of such persons who are out of the corruption loop could take up the war against corruption at one time or the other. But, they would find that in a corruption entrenched system, they would not be able to improve the conditions and therefore, a few of them may finally take to physical attack on corrupt and dishonest persons, leading to violence and bloodshed. Security, dogs and mere police rifles will not be able to beat down such determined crusaders.

The politicians and bureaucrats would call such crusaders as arsonists or terrorists. But, history would judge them differently. There are a number of determined isolated war groups already existing in the country and they are generally branded as terrorist groups and treated brutally by the state machinery, without investigating the reasons for their existence. One would shudder to think as what would happen to the peace of the society, if such groups would enlarge in size and number.

Those holding the positions of President, Prime Minister and Deputy Prime Minister of this country and Chief Ministers of the states should have the wisdom to realize the potential dangers facing this corrupt ridden Indian society. They should not remain as small people who would compromise with the aspects of good governance for the sake of remaining in power for a few number of days more.

Roots (Definitions) of Corruption

Posted by Rebellious Indians

Corruption literally means to destroy (Latin word corruptus).It is not a rare phenomenon.
It takes many forms with different types of participants, settings, stakes, techniques and 
different degrees of cultural legitimacy.
is not only about stealing: it can also relate to the abuse of power in decision-making 
processes. It is a form of behaviour
that deviates from ethics, morality, tradition, law and civic virtue.
Corruption may be defined as any conduct which amounts to
 influencing the decision-making process of a public officer or authority, 
 or influence peddling;
  • dishonesty or breach of trust, by a public officer, in the exercise of his duty;
  • insider dealing/conflicts of interests;
  • influence peddling by the use of fraudulent means such as bribery, blackmail, which includes the use of election fraud.
Any person who directly or indirectly accepts, agrees or offers to accept any gratification from any other person to benefit him-/herself or any other person is guilty of the crime of corruption. The person who makes the offer or inducement to another to commit a corrupt practice is also guilty of the crime of corruption.
Although there is an active and a passive side to the crime, both parties are equally guilty of corruption.

Whilst there is no single definition for corruption, common definitions include:
  • Corruption involves behaviour on the part of persons in which they improperly enrich themselves or those close to them by misusing power with which they have been entrusted. In short, corruption is the misuse of public power for personal gain.
    [National Integrity Promotion Campaign - Namibia]
  • In broad terms, corruption is the abuse of public office for private gain. It encompasses unilateral abuses by government officials such as embezzlement and nepotism, as well as abuses linking public and private actors such as bribery, extortion, influence peddling, and fraud. Corruption arises in both political and bureaucratic offices and can be petty or grand, organized or unorganized. Though corruption often facilitates criminal activities such as drug trafficking, money laundering, and prostitution, it is not restricted to these activities. For purposes of understanding the problem and devising remedies, it is important to keep crime and corruption analytically distinct.
    [Handbook on fighting corruption, the Centre for Democracy and Governance]
  • Behaviour on the part of officials in the public sector, whether politicians or civil servants, in which they improperly and unlawfully enrich themselves, or those close to them, by the misuse of the public power entrusted to them. This would include embezzlement of funds, theft of corporate or public property as well as corrupt practices such as bribery, extortion or influence peddling.
    [Transparency International (TI)]
  • Corruption is an abuse of (public) power for private gain that hampers the public interest. corrupt entails a confusion of the private with the public sphere or an illicit exchange between the two spheres. In essence, corrupt practices involve public officials acting in the best interest of private concerns (their own or those of others) regardless of, or against, the public interest.
    [United Nations Manual on Anti-Corruption Policy]
  • An act done with an intent to give some advantage inconsistent with official duty and the rights of others. It includes bribery, but is more comprehensive; because an act may be corruptly done, though the advantage to be derived from it be not offered by another.
    [Law Library ’s Lexicon]
  • Corruption involves behaviour on the part of officials in the public and private sectors, in which they improperly and unlawfully enrich themselves and/or those close to them, or induce others to do so, by misusing the position in which they are placed.
    [World Bank]
  • The promise, offering or giving to a public official, directly or indirectly, of an undue advantage, for the official himself or herself or another person or entity, in order that the official act or refrain from acting in the exercise of his or her official duties.
The solicitation or acceptance by a public official, directly or indirectly, of an undue advantage, for the official himself or herself or another person or entity, in order that the official act or refrain from acting in the exercise of his or her official duties.
[Article 8 of the Convention against Transnational Organized Crime]
  • To spoil or destroy by putrid decomposition; to turn from a sound into an unsound condition; to infect, taint, render morbid; to adulterate; to debase, to defile; to putrefy, rot, decay; to destroy the moral purity or chastity of; to destroy or pervert the integrity or fidelity of (a person) in his discharge of duty; to induce to act dishonestly or unfaithfully; to make venal; to bribe; to pervert the text or sense of (a law etc.) by altering it for evil ends.
    [Oxford English Dictionary]
  • Guilty of dishonest practices, (such) as bribery; without integrity; debased in character; depraved; perverted; crooked; wicked; evil; decayed; putrid; infected; tainted. Applies to one, esp. in public office, who acts on mercenary motives, without regard to honour, right or justice.
    [Webster's Unabridged Dictionary of the English Language]
  • The use of official position, rank or status by an office bearer for his own personal benefit .
    [U Myint]


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